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गंगा को बचाने के लिए चाहिए कई भागीरथ

Posted On April - 6 - 2010

सार्थक पहल

ज्ञानेन्द्र रावत

गंगा मुक्ति और उसकी शुद्धि हेतु बरसों से जारी आंदोलनों और संत समाज के घोर-विरोध को मद्देनजर रखते हुए केन्द्र सरकार ने अब कहीं जाकर भागीरथी पर बन रही उत्तराखंड की भैंरों घाटी और मनेरी भाली इन दो परियोजनाओं को निरस्त कर दिया है और केन्द्र की एनटीपीसी की लोहारी नागपाला योजना को निरस्त करने का सैद्धांतिक निर्णय ले लिया है। पर्यावरण मंत्री के अनुसार इसके तकनीकी पहलुओं के अध्ययन हेतु पांच सदस्यीय कमेटी का गठन किया जायेगा जो यह विचार करेगी कि लोहारी नागपाला परियोजना बंद होने से स्थानीय क्षेत्र पर क्या असर पड़ेगा। गौरतलब है कि इस परियोजना पर अब तक 600 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं और लगभग तीस फीसदी काम भी किया जा चुका है। सरकार के इस निर्णय से संत समाज और इस हेतु संघर्षरत संगठनों में खुशी की लहर है। इस बारे में पर्यावरणविद राजेन्द्र सिंह कहते हैं कि ‘गंगोत्री से उत्तरकाशी तक की 135 किमी की दूरी में भागीरथी को ‘नो प्रोजेक्ट जोनÓ बनाने का व दो पनबिजली परियोजनाओं को निरस्त करने का सरकार का निर्णय प्रशंसनीय है। काशी विश्वविद्यालय के प्रो. यूके चौधरी की माने तो अकेले भागीरथी पर बांध निर्माण रोके जाने से गंगा की अविरलता बरकरार नहीं रहेगी। गंगा पर और उसकी सहायक नदियों पर भी बांध निर्माण के कार्य रोकने होंगे। इसके साथ उसे प्रदूषण से बचाना भी सबसे अहम काम होगा। सरकार के इस निर्णय के बाद अब यह सवाल बहस का मुद्दा बन गया है कि क्या इसके बाद भी गंगा बचेगी? वह शुद्ध हो पायेगी? क्या उसे बचाने हेतु समाज आगे आकर आन्दोलन करेगा और क्या साधु समाज इसमें अपनी भूमिका निभायेगा?
सरकार गंगा-शुद्धि के दावे करते नहीं थकती जबकि हकीकत यह है कि गंगा आज भी मैली है। उसका जल आचमन करने लायक तक नहीं बचा है। बीते वर्षों में किये गये शोध और अध्ययन इसके जीवंत प्रमाण हैं। गौरतलब यह है कि 2510 किलोमीटर लंबे गंगा के तटों पर तकरीब 29 बड़े, 23 मंझोले और 48 कस्बे पड़ते हैं। वहां स्थापित छोटे-बड़े कारखानों का विषैला रसायनयुक्त कचरा और नगरों का तकरीबन 2538 से अधिक एमएलडी सीवेज गंगा में गिरता है। उस हालत में जबकि गंगा एक्शन प्लान एक के तहत 865 एमएलडी तथा दो के तहत 780 एमएलडी सीवेज का शोधन हो पाता है। जाहिर है यह तो मात्र 35 फीसदी ही है, जबकि 65 फीसदी बिना शोधन के सीधा गंगा में गिरता है।
इसके अलावा गंगा के निकास से उसके किनारे बसे तीर्थ, आश्रम व होटलों का मल-मूत्र-कचरा भी तो गंगा में जाता है। यदि पर्यावरण मंत्रालय के हालिया अध्ययनों पर दृष्टि डालें तो खुलासा होता है कि कन्नौज, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी और पटना सहित कई जगहों पर पानी नहाने लायक भी नहीं रहा है। गंगा एक्शन प्लान की नाकामी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सच तो यह है कि गंगा पर अपने उद्गम से ही संकट बरकरार है। देखा जाये तो वर्ष 2008 के नवंबर महीने में गंगा के राष्ट्रीय नदी घोषित होने और फिर 2009 में राष्ट्रीय नदी घाटी प्राधिकरण बनने के बाद यह आशा बंधी थी कि अब गंगा के शुद्ध व सदानीरा बनने और उसकी अविरलता सुनिश्चित होने का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा लेकिन कुछ ही समय बाद गंगा की शुद्धि का सपना सपना ही रह गया। पिछले कई वर्षों से गंगा पर जारी बहुतेरी जल विद्युत परियोजनाओं के विरोध में आंदोलन चल रहे हैं। उसके बावजूद गंगा पर बांध निर्माण का काम थमा नहीं। अंतत: प्रो जीडी अग्रवाल के आमरण अनशन ने गंगा पर बांध निर्माण के विरोध के स्वरों को आवाज दी जिसके परिणामस्वरूप सरकार को इस संबंध में समिति बनाने पर मजबूर होना पड़ा। लेकिन गोमुख से उत्तरकाशी तक गंगा की अविरलता, गंगा जल की पवित्रता, उसके निर्विघ्न लगातार प्रवाह की सुनिश्चितता और उस पर बांध निर्माण रोकने का सवाल तकनीकी मुद्दों के जाल में उलझकर रह गया। फिर गंगा के लिए संघर्षरत संगठनों की उपरोक्त मांग को भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय द्वारा स्वीकार तो कर लिया गया लेकिन उसके बाद भी बांध निर्माण का काम जारी रहा। इसके विरोध में जी डी अग्रवाल ने 2009 में मकर संक्रांति से दिल्ली में पुन: आमरण अनशन किया, तब कहीं जाकर भारत सरकार ने गंगा पर नये बांध नहीं बनाने और निर्माणाधीन परियोजनाओं का काम बंद कराने का निर्णय लिया। हाईकोर्ट ने भी इसका फैसला राष्ट्रीय नदी घाटी प्राधिकरण पर छोड़ दिया। अंत में 30 नवम्बर को प्राधिकरण के गैर सरकारी सदस्यों ने सर्वसम्मति से इन परियोजनाओं का काम रोकने की सिफारिश की। नतीजतन दो महीनों के अदंर दोनों पक्षों को सुनकर निर्णय किये जाने का प्रस्ताव भी पारित हुआ। ऊर्जा एवम् पर्यावरण मंत्रालय ने भी अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंप दी थी। उस पर प्रधानमंत्री की संस्तुति के बाद राष्ट्रीय नदी घाटी प्राधिकरण, पर्यावरण मंत्रालय की आखिरी मुहर लगनी थी। उसमें इतना विलम्ब हुआ और थक-हारकर संत समाज को आगे आना पड़ा।
पर्यावरणविद, गंगा मुक्ति हेतु संघर्षरत संगठनों और देश की धर्मभीरू जनता भी यही चाहती है कि गंगा नैसर्गिक रूप से बहे, इस विवादास्पद परियोजना का काम हमेशा के लिए रुक जाये और गंगा भूमि के प्रवाह क्षेत्र, बाढ़ क्षेत्र, अति बाढ़ क्षेत्र का सीमंाकन हो और इस बारे में राष्ट्र को अवगत कराया जाये। नदी भूमि के रूपांतरण व हस्तांतरण पर रोक लगे, गंगा की भागीरथी, अलकनंदा और सभी उपनदियों में गंगा घाटी संगठन बनाकर उन्हें नदी शुद्धि की सहभागी जिम्मेदारी सौंपी जाये। सबसे बड़ी बात यह कि गंगा को प्रदूषणमुक्त करने हेतु भारतीय पद्धतियों का प्रयोग किया जाये। पुराने बांधों पर पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करके गंगा का पर्यावरणीय प्रवाह प्रदान किया जाये, गंदे नालों को ट्रीटमेंट करके उस पानी को किसी भी कीमत पर गंगा में न छोड़ा जाये, गंगा क्षेत्र के सभी गंदे नालों के उपचार के बाद वह पानी खेती और बागबानी में उपयोग किया जाये और यह काम समाज की समझ और सहयोग से सम्पादित किया जाये। इसके लिए तो सरकार को पंचायत स्तर से लेकर कस्बा, नगर, महानगर और राजधानियों तक जनचेतना जागृति कार्यक्रम शुरू करने होंगे और गंगा में प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ दण्ड की कार्यवाही सुनिश्चित करनी होगी। तभी कुछ सार्थक परिणाम की आशा की जा सकती है अन्यथा नहीं।
गंगा सेवा अभियान के तहत तो राजेन्द्र सिंह ने गंगोत्री से लेकर गंगा सागर व गंगा सागर से गंगोत्री तक और देश के अनेकानेक महानगरों-नगरों-कस्बों तक में जन जागृति यात्राएं की हैं। ये सभी संगठन और व्यक्ति पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश और प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह की ओर आज भी टकटकी लगाए इस आशा से देख रहे हैं कि वे गंगा और उसकी अन्य सहायक नदियों पर जारी अन्य पन-बिजली परियोजनाओं का काम रोक देंगे और हरिद्वार से लेकर गंगा के आखिरी छोर यानी समुद्र में मिलने तक उसकी शुद्धि को प्राथमिकता देंगे। अब देखना यह है कि गंगा शुद्धि के बारे में सरकार करती क्या है। आजकल हरिद्वार में महाकुंभ जारी है। इस अवसर पर करोड़ों-करोड़ श्रद्धालु हरिद्वार आकर गंगा स्नान कर अपने जीवन को सफल और धन्य समझेंगे। लेकिन वह इस से अनजान हैं कि वह स्वयं अपने कृत्यों से उसे किस सीमा तक प्रदूषित कर रहे हैं और उसके फलस्वरूप उनकी आस्था की प्रतीक जीवनदायिनी पुण्यसलिला गंगा किन-किन समस्याओं का सामना कर रही है। फिर भी गंगा के प्रति लोगों की श्रद्धा बरकरार है और जीवन में मोक्ष व पुण्यप्राप्ति की लालसा में वे पर्वों पर गंगा में डुबकी तो जरूर लगाते हैं लेकिन अब लगता है कि डिब्बों में गंगाजल भरकर घर ले जाने का तारतम्य टूट-सा रहा है। बीता इतिहास गवाह है कि सरकार ने आश्वासन तो बहुत दिये हैं लेकिन उन्हें पूरा आज तक कर पाने में वह नाकाम रही है। आगे क्या होता है यह भविष्य के गर्भ में है। इतनी पवित्र, पुण्यसलिला मानी जाने वाली गंगा को प्रदूषण मुक्त करने के सवाल पर यदि सरकारें इसी तरह हकीकत से मुंह फेरती रहीं तो इसकी संभावना न के बराबर ही है कि शायद ही कभी गंगा स्वच्छ हो पाये।


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