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कारोबारियों के चक्रव्यूह में क्रिकेट

Posted On April - 7 - 2010

राजकुमार सिंह
दरअसल

देश आईपीएल की गिरफ्त में है। क्रिकेट के इस मनोरंजक संस्करण का नशा सभी के सिर चढ़ कर बोल रहा है। खेल के नाम पर सामने आये इस नये तमाशे का कारोबार अब चार अरब डॉलर से भी ज्यादा का हो गया है। देश के विश्वव्यापी आर्थिक मंदी के असर से उबर आने के दावे करने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी चाहें तो खुश होकर अपने दावों के समर्थन में अब आईपीएल में लगने वाले बड़े-बड़े दांवों के उदाहरण भी दे सकते हैं। पिछले अस्सी वर्षों में सबसे भयावह बतायी जा रही इस आर्थिक मंदी से पहले आईपीएल की आठ टीमें कुल जितने में बिकी थीं, विश्वव्यापी त्राहि- त्राहि का कारण बनी आर्थिक मंदी के बीच पिछले महीने उसी आईपीएल में दो नयी टीमें उससे आठ गुना कीमत में बिकीं।
खरीद-फरोख्त और नीलामी सरीखे शब्द कई भले लोगों को खेल और खिलाडिय़ों की गरिमा के प्रतिकूल लग सकते हैं, पर सच्चाई से मुंह कैसे और कब तक चुरायेंगे? सच तो यही है कि मौजूदा आठ टीमों की तरह इन दो नयी टीमों—पुणे और कोच्चि की भी खुली नीलामी हुई और बाकायदा बोली लगायी गयी। पुणे टीम की फ्रेंचाइजी सहारा इंडिया ने 1700 करोड़ से भी ज्यादा में खरीदी तो कोच्चि की फं्रेचाइजी रेंदेवू ने 1500 करोड़ रुपये में यानी सिर्फ दो टीमों की ही क ीमत तीन हजार करोड़ रुपये से ज्यादा। इस नीलामी से पहले, मौजूदा आईपीएल-3 के लिए एक-एक खिलाड़ी ही आठ करोड़ रुपये से ऊपर निकल गया। जिन लोगों के लिए आईपीएल ही सब कुछ है और आंकड़े ही अर्थव्यवस्था का अंतिम सच, उनके लिए कहंा है आर्थिक मंदी?
रहा सवाल खेल और खिलाडिय़ों की गरिमा का तो नीलामी में शामिल होने आये बेचारे पाकिस्तानी क्रिकेटरों की जब किसी फं्रेचाइजी ने बोली ही नहीं लगायी तो उन्हें यह अपना ही नहीं, अपने देश का भी अपमान लगा।
अकसर कहा जाता था कि लोग अब टिकट खरीद कर खेल देखने नहीं आते, लेकिन अब आलम यह है कि निर्धारित कीमत पर तो टिकट पहले ही गायब हो जाते हैं और लोग ब्लैक में भी टिकट खरीदने में कोई संकोच नहीं कर रहे। अब ये टिकट दर्शकों को बिना बिके ही कैसे गायब हो जाते हंै और गायब होकर भी ब्लैक में फिर कैसे उपलब्ध हो जाते हैं? इस गोरखधंधे को समझने के लिए किसी सीबीआई जांच या शोध की जरूरत तो नहीं ही होनी चाहिए। देश की राजधानी दिल्ली तक में यही हो रहा है। लोग हजार से लाख रुपये तक की टिकट खरीद कर भी मैच देखने जा रहे हैं। अब कहा तो यही जाता है कि मैच देखने जा रहे हैं, वैसे सभी जानते हैं कि अब चीयर लीडर्स के लटके-झटके किसी खिलाड़ी के कमाल से कम महत्वपूर्ण नहीं रह गये हैं और फिर आईपीएल-3 से मंदिरा बेदी भले ही नदारद हों , पर महंगी टिकट के खरीददारों को तो खेल के बीच ही मदिरा भी परोसी ही जाती है।
जो इतने महंंगे टिकट नहीं खरीद सकते या फिर तीन घंटे के तमाशे के लिए आधे दिन या आधी रात तक की जद्दोजहद नहीं कर सकते, वे तमाम काम छोड़कर मैच से पहले ही घर पहुंच टीवी के सामने जम जाते हैं। कुछ लोगों को यह अतिशयोक्ति लग सकती है, पर टीवी दर्शकों के आंकड़े बताते हैं कि यह संख्या न सिर्फ बढ़ रही है, बल्कि आईपीएल दर्शकों में महिलाओं की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। यह एक अप्रत्याशित रुझान है,जिसने महिलाओं को भावनात्मक रूप से बांधने वाले टीवी सीरियलों के सफल कारोबारियों को भी संकट में डाल दिया है। आईपीएल-3 का सत्र काफी लंबा है, पर इस दौरान अभी तक कोई बड़ा बैनर अपनी फिल्म रिलीज करने का साहस नहीं जुटा पाया है।
जाहिर है, आईपीएल की लोकप्रियता को आयोजक दोनों हाथों से दुह रहे हैं। कौडिय़ों के भाव भी न बिकने वाली टिकटें अचानक बहुत महंगी हो गयी हैं तो मैदान में खिलाड़ी भी प्रायोजकों और कंपनियों के चलते-फिरते विज्ञापन नजर आते हैं। क्रिकेट से कमाई के संदर्भ में कभी दुनिया जगमोहन डालमिया के करिश्मे का लोहा मानती थी, पर अब ललित मोदी ने सभी को पीछे छोड़ दिया है। भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को संभवत: दुनिया का सबसे धनी खेल संघ तो डालमिया ने ही बनाया था और उसके बूते गोरी चमड़ी के वर्चस्व को तोड़कर उसमें भारतीय उप महाद्वीप की तूती भी खूब बोली, लेकिन मोदी ने आईपीएल के जरिये जो कर दिखाया है, उसकी तो शायद कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी।
मैचों के प्रसारण अधिकार बेच कर कमाई करना तो बेहद आसान और प्रचलित माध्यम है, पर मोदी तो खिलाडिय़ों के शरीर का एक-एक इंच हिस्सा और खेल और दर्शकों के बीच उपलब्ध हर चीज बेच रहे हैं। यहां तक कि ओवर के बीच भी वह विज्ञापन दिखाकर मोटी कमाई कर रहे हैं। मौटे तौर पर कह सकते हैं कि वह क्रिकेट को बेच रहे हैं और बेहद सफलतापूर्वक बेच रहे हैं।
आम तौर पर सफलता को लेकर सवाल नहीं उठाये जाते, पर आईपीएल और मोदी को लेकर उठ रहे हैं। भद्रजनों के रूप क्रिकेट और उसकी कला-तकनीक को प्यार करने वाले तो शुरू से ही आईपीएल को असली क्रिकेट के लिए खतरे के रूप में देख रहे हैं, पर केंद्रीय खेल मंत्री मनोहर सिंह गिल ने भी इसकी जम कर आलेचना की है।
हर खेल एक कला है और हम सभी जानते हैं कि कला में पारंगत होने के लिए साधना की जरूरत होती है। अटूट समर्पण और साधना के बल पर ही कोई डॉन बे्रडमैन, गैरी सोबर्स, सुनील गावस्कर, कपिलदेव, सचिन तेंदुलकर, ब्रायन लारा बनता है, लेकिन लोकप्रियता बनाकर उससे कमाई करने के फेर में जिस तरह क्रिकेट को तमाशे में तबदील किया जा रहा है, वह एक दिन इस खेल को ही खत्म कर देगा। पांच दिवसीय टेस्ट की कथित नीरसता तोडऩे के नाम पर पिछली शताब्दी के उत्तराद्र्ध में सीमित ओवरों वाला एकदिवसीय क्रिकेट शुरू किया गया था तो अब इक्कीसवीं शताब्दी में टी-ट्वेंटी के नाम पर 20-20 ओवरों वाले त्वरित क्रिकेट का प्रयोग किया जा रहा है।
लोकप्रियता और अर्थशास्त्र अपनी जगह हैं, पर यदि आप क्रिकेट की मौलिकता के मद्देनजर परखेंगे तो कोई भी निष्पक्ष खेल पंडित यही मानेगा कि एकदिवसीय क्रिकेट ने टेस्ट क्रिकेट को जबर्दस्त नुकसान पहुंचाया है। कला और तकनीक पर ताकत हावी हो गयी है और खिलाडिय़ों का उद्देश्य पारंगत होने के बजाय मैच में प्रदर्शन तक सीमित होकर रह गया है। पहले बेहतर गेंद को सम्मान देते हुए रक्षात्मक ढंग से खेल देना भी क्रिकेट का अहम हिस्सा था और इस पर भी तालियां बजती थीं, लेकिन फटाफट क्रिकेट में तो सही हो या गलत, बस शॉट और रन ही चाहिए।
क्रिकेट के नियमों और स्थापित परंपराओं के उलट खेलने वाले जिन खिलाडिय़ों को शायद साठ और सत्तर के दशक में भी कोई अच्छा कोच टीम तो दूर, ट्रायल में भी शामिल नहीं करता, वे फटाफट क्रिकेट के नये हीरो हैं। माना कि तेंदुलकर, कैलिस, गेल, गिब्स, मुरलीधरन, शेन वार्न और कुंबले सरीखे खिलाड़ी फटाफट क्रिकेट में भी सफलता के झंडे गाड़ रहे हैं, पर वे उम्र के इस पड़ाव पर भी ऐसा इसलिए कर पा रहे हैं,क्योंकि वे क्रिकेटीय कला और तकनीक की ठोस जमीन पर खड़े हैं। कला और तकनीक को दरकिनार कर तात्कालिक सफलता के लिए सिर्फ ताकत के सहारे फटाफट क्रिकेट के हीरो बन रहे खिलाडिय़ों के लिए अपनी इस सफलता को एकदिवसीय और टेस्ट क्रिकेट में तो कायम रख पाना असंभव होगा ही, फटाफट क्रिकेट में भी दोहरा पाना आसान नहीं होगा।
जरा याद करिए कि आईपीएल-1 के नये सितारों में से आज कितने चमक रहे हैं? आईपीएल के चक्रव्यूह का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि लगभग अनाम और नये खिलाडिय़ों पर जल्द से जल्द ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाने के लिए इसी फटाफट क्रिकेट को अपनी पहली कसौटी बनाने का दबाव रहेगा और यही दबाव उन्हें बेहतर क्रिकेटर कभी बनने नहीं देगा। दरअसल यह क्रिकेट न होकर कारोबार है। इसीलिए आयोजकों और प्रायोजकों से लेकर टीम के फंरेचाइजी तक हर ओर आपको कारोबारी ही नजर आते हैं। वे ही इस खेलरूपी तमाशे के मदारी या खेलरूपी सर्कस के रिंग मास्टर हैं और खिलाडिय़ों की भूमिका चीयर लीडर्स से कुछ ज्यादा सही, पर गेंद-बल्ले के जरिये मनोरंजन तक ही सीमित है। इसीलिए तो इसे और अधिक मनोरंजक बनाने के लिए नियम भी तोड़े-मरोड़े जा रहे हैं।


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