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कारों की संख्या घटाने से होगा आर्थिक विकास

Posted On April - 7 - 2010

डॉ. भरत झुनझुनवाला

यातायात समस्या


धुनिक अर्थशास्त्र के प्रणेता एडम स्मिथ ने सिद्धांत बताया था कि खुले बाजार में लोगों द्वारा अपना व्यक्तिगत हित साधने में सामाजिक हित अनायास ही स्थापित हो जाता है। व्यापारी का लक्ष्य व्यक्तिगत लाभ कमाना मात्र होता है। परन्तु लाभ कमाने की प्रक्रिया में व्यापारी सस्ते माल का उत्पादन करता है। फलस्वरूप उपभोक्ता को सस्ता माल हासिल हो जाता है। जैसे टैक्सी ड्राइवर गाड़ी में सीएनजी महज इसलिये फिट करता है कि ईंधन की लागत कम हो जाये। परन्तु समयक्रम में सीएनजी का किराया सरकार द्वारा कम निर्धारित किया जाता है और यात्री को टैक्सी का खर्च कम देना पड़ता है। ध्यान देने की बात है कि अनेक वर्षों से सीएनजी तकनीक की जानकारी टैक्सी चालकों को थी परन्तु ये सीएनजी नहीं लगवाते थे। कुछ वर्ष पूर्व दिल्ली जैसे शहर में सरकार ने बसों में सीएनजी लगवाना अनिवार्य कर दिया तथा तेल कम्पनियों को सीएनजी पम्प लगाने के निर्देश दिये। सरकार के इस दबाव में टैक्सी चालकों ने सीएनजी लगवाया और जनहित हासिल हुआ। बाज़ार को खुला छोड़ देने से सीएनजी नहीं लगाया गया। सरकार के द्वारा दिशा देने पर टैक्सी मालिकों ने अपने स्वार्थ को विशेष दिशा में मोड़ा और जनहित स्थापित हुआ। तात्पर्य यह कि एडम स्मिथ के फार्मूले का अर्थ सरकार की समाप्ति नहीं बल्कि विशेष प्रकार का नियंत्रण है। समुचित नियंत्रण के अभाव में एडम स्मिथ का फार्मूला फेल हो जाता है जैसा कि अनेक वर्षों तक टैक्सी चालकों ने सीएनजी फिट नहीं करवाया था।
विशेष बात यह है कि सीएनजी फिट करने से देश का सकल घरेलू उत्पाद घटता है। मान लीजिये चेन्नई में प्रतिदिन एक लाख किलोमीटर टैक्सी चलती है। पेट्रोल से चलने वाली टैक्सी का किराया 8 रुपये प्रति किलोमीटर है जबकि सीएनजी का किराया 5 रुपये प्रति किलोमीटर पड़ता है। ऐसे में दैनिक सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट आती है।
यह बात ऑटोमोबाइल उद्योग पर विशेष रूप से लागू होती है। कार के अधिकाधिक निर्माण और उपयोग के पीछे सोच थी कि कार उपलब्ध होने से लोग अपने गंतव्य तक शीघ्र पहुंच जायेंगे। जो समय बस स्टैंड पर खड़े रहने, बस बदलने और बस स्टैंड से रिक्शा लेकर गंतव्य तक पहुंचने में लग जाता है वह बच जायेगा और लोग बिना थके शीघ्र पहुंचकर उस बचे हुए समय का सही प्रयोग कर सकेंगे। कार के मालिकों के जीवन स्तर में भी सुधार होगा। बच्चे स्कूल समय से पहुंच सकेंगे और गृहणी शापिंग के लिए आसानी से जा सकेगी। ऑटोमोबाइल उद्योग भी लाभ कमायेगा। परन्तु कार की संख्या में वृद्धि का ऐसा सार्थक प्रभाव दृष्टिगत नहीं होता है। आज शहरों की सड़कों पर ट्रैफिक जाम लग रहे हैं। कार के उत्पादन का उद्देश्य था कि लोग अपने गंतव्य स्थान पर शीघ्र एवं आरामपूर्वक पहुंच सकेंगे किन्तु हो रहा है इसके ठीक विपरीत। गन्तव्य तक पहुंचने में समय ज्यादा लग रहा है और जनता कार मेें बैठे काले पानी की सजा अनायास ही भोग रही है।
पिछले दिनों देश के तीन महानगरों में यात्रा करने का अवसर प्राप्त हुआ था। कोलकाता में हावड़ा स्टेशन से बालीगंज पहुंचने में एक घंटा लगा। बंगलूर में कृष्णराजपुरम् से बसवनगुड़ी पहुंचने में डेढ़ घंटे लगे। दिल्ली में निजामुद्दीन से करोलबाग पहुंचने में दो घंटे लगे। पूर्व में ये यात्राएं इससे तिहाई समय में हो जाती थीं। दूसरे देशों में भी ऐसी ही परिस्थिति है। आस्ट्रेलिया में परामत्ता से सिडनी पहुंचने में सौ वर्ष पूर्व घोड़ा गाड़ी से एक घंटे का समय लगता था। आज इससे ज्यादा समय कार से पहुंचने में लगता है। अनुमान है कि आस्ट्रेलिया में 2020 तक कार यात्रा का समय वर्तमान से दुगना हो जायेगा। जिस प्रकार अधिक भोजन करने से अपच हो जाता है उसी प्रकार कार की संख्या अधिक हो जाने से ट्रैफिक का अपच हो गया है। यात्रा का औसत समय घटने के स्थान पर बढ़ गया है।
ट्रैफिक जाम से केवल कार में बैठे यात्री ही परेशान नहीं होते हैंं बल्कि स्कूटर और साइकिल सवारों को भी परेशान होना पड़ रहा है। कहीं-कहीं पैदल चलना भी संभव नहीं रह गया है। देश के लिए यह हर प्रकार से घाटे का सौदा है। सड़कों एवं कारों में हमारी पूंजी लग रही है। यात्रा में समय ज्यादा खप रहा है। ऊपर से सामान्य यात्रियों को भी परेशानी हो रही है। आंकड़ों में आर्थिक विकास अवश्य दिख रहा है चूंकि कार ज्यादा संख्या में बिक रही है। जाम में खड़ी कार का इंजन चालू रहने के कारण पेट्रोल फूंका जा रहा है जो कि हमारे सकल उत्पाद में जुड़ जाता है परन्तु यह विकास नाकाम है।
कार के इंजन की नई उन्नत तकनीकों से समस्या और बढ़ती जा रही है। सत्तर के दशक में एम्बेसडर कार से 11 किलोमीटर प्रति लिटर का एवरेज मिलता था। आज के नये मॉडल से 20 किलोमीटर का एवरेज मिलने लगा है। इससे यात्रा का खर्च कम हो गया है, लोग कार का उपयोग ज्यादा कर रहे हैं और ट्रैफिक जाम बढ़ रहे हैं। अगले चरण में यदि 30 किलोमीटर का एवरेज मिलने लगा तो समस्या और गम्भीर हो जायेगी चूंकि कार यात्रियों की संख्या बढ़ जायेगी।
मेट्र्रो बनाने एवं बसों की संख्या बढ़ाने से भी समस्या का हल नहीं निकलता है। यूनिवर्सिटी आफ टोरंटो के प्रोफेसर मैथ्यू टर्नर लिखते हैं : ‘बस की संख्या में वृद्धि का प्रभाव सड़क बनाने के समान होता है। हर व्यक्ति जो कार छोड़कर बस में यात्रा करता है वह कुछ समय के लिये सड़क को खाली कर देता है। शीघ्र ही दूसरे लोगों द्वारा इस खालीपन को भर दिया जाता है।Ó इस प्रकार बस एवं मेट्रो से कुल यात्रियों की संख्या में वृद्धि होती है परन्तु सड़क पर कार का ट्रैफिक कम नहीं होता है।
ट्रैफिक जाम का एकमात्र हल शहरों के भीड़ क्षेत्र में कार चलाने पर विशेष टैक्स लगाना है। इसे ‘भीड़ टैक्सÓ का नाम दिया जा सकता है। लंदन शहर के केन्द्र में कार चलाने को एक दिन का 500 रुपये का परमिट खरीदना पड़ता है। स्टॉकहोम, सिंगापुर एवं सियोल जैसे महानगरों में भी इसी प्रकार के टैक्स लगाये गये हैं और सार्थक परिणाम सामने आये हैं। हमें सभी शहरों के चिह्निïत इलाकों में प्रवेश पर 1000 रुपये प्रतिदिन का परमिट लागू करना चाहिए। टैक्सियों के लिए भी इन क्षेत्रों में प्रवेश को महंगे परमिट जारी करने चाहिए। केवल सचिव स्तर के अधिकारियों एवं मंत्रियों को इस टैक्स से छूट दी जानी चाहिए। साथ-साथ बस एवं मेट्रो का विस्तार किया जाना चाहिए।
कार उद्योगपतियों की दृष्टि सीमित है। उन्हें केवल कार बनाकर बेचने से मतलब है। उन्हें इस बात से क्या लेना-देना कि कार की संख्या में अति वृद्धि से यात्री का समय बर्बाद हो रहा है। कार की संख्या के निर्धारण को बाजार की स्वतंत्र चाल पर नहीं छोडऩा चाहिए। एडम स्मिथ के सुझाव का समुचित अनुपालन होना चाहिए। ऐसे नियम-कानून बनाने चाहिए कि लोग कार में सफर कम करें और गन्तव्य स्थान पर शीघ्र पहुंचें। कार के उत्पादन एवं पेट्रोल की बिक्री कम होने से सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट अवश्य आयेगी परन्तु इससे ज्यादा वृद्धि समय की बचत और उससे होने वाले लाभों में होगी।


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