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करबद्ध प्रार्थना !

Posted On April - 5 - 2010

बात की बात
सहीराम
अमेरिका ने एक आतंकवादी पकड़ा। आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि इधर अमेरिका का काम आतंकवाद से लडऩा, उसे खत्म करना और आतंकवादी पकडऩा ही तो रह गया है। यह अलग बात है कि न तो वह आतंकवाद से लड़ पा रहा है, न उसे खत्म कर पा रहा है और न ही आतंकवादियों को पकड़ पा रहा है। बताइए, ओसामा बिन लादेन कहां पकड़ा गया अभी तक? अगर सचमुच उसे आतंकवादी पकडऩे हैं तो पाकिस्तान चला जाए। वहां अनगिनत मिल जाएंगे। पर वह पाकिस्तान नहीं जाता। न वहां के आतंकवादियों को पकडऩे में उसकी कोई रुचि है। फिर भी अमेरिका ने एक आतंकवादी पकड़ा। नाम है— हेडली। वह अमेरिकी नागरिक है। सबसे पहले तो लोगों को यही आश्चर्य हुआ कि अमेरिका में भी आतंकवादी होते हैं। अमेरिका के हिसाब से आतंकवादी दुनिया में तो खूब हैं, पर अमेरिका में भी हैं, यह तो कमाल ही हो गया। अमेरिका वाले दूसरों को आतंकवादी करार देने में जरा भी देर नहीं लगाते, पर  उन्हें अपना आतंकवाद और अपने आतंकवादी देखने की कहां फुर्सत है, पर पता नहीं कैसे हेडली को उन्होंने पकड़ लिया।
बाद में पता चला कि वह अमेरिकी नागरिक तो ज़रूर है, पर है पाकिस्तानी मूल का। उसका साथी तहव्वुर राणा भी पाकिस्तानी है। लोग सही साबित हुए, उन्हें तसल्ली हुई कि चलो अमेरिकी नहीं पकड़ा गया और आखिर में अमेरिका ने एक पाकिस्तानी को भी पकड़ ही लिया। चाहे पाकिस्तान में आकर न पकड़ा हो, अमेरिका में ही पकड़ा हो।
पर जब अमेरिका ने उसे पकड़ा था, तभी पता चल गया था कि वह अमेरिका का नहीं बल्कि हमारा मुजरिम है। वही है जिसने मुंबई के हमलों में आतंकवादियों को मदद मुहैया करायी। हमें लगा था कि अब हम मुंबई के हमलावरों को सज़ा दिलवा पाएंगे क्योंकि एक ठोस सबूत मिल गया है। वह चाहे अल-कायदा का हो या लश्कर या जैश का, किसी भी तंजीम का हो, है तो आतंकवादी और उसने मुंबई के हमलावरों की मदद भी की थी।
इसलिए भारत ने कहा हमारा मुजरिम है, हमें दे दो। पर अमेरिका ने कहा— वाह भाई वाह! ऐसे कैसे दे दें। हमने पकड़ा है। अभी तो हमें उससे पूछताछ करनी है। एफबीआई दूसरे मुल्कों में जाकर मुजरिमों से पूछताछ कर सकती है तो अपने पकड़े हुए मुजरिम से पूछताछ भी न करे?
भारत ने कहा— अच्छा हम उससे पूछताछ तो कर ही सकते हैं न। अमेरिका ने कहा— अरे भाई, ऐसे कैसे कर लोगे? पहले एफबीआई को तो करने दो। खैर जी, कई महीने से मामला ऐसे ही चल रहा है। अब हम पाकिस्तान को तो गाली दे सकते हैं, उसे बुरा-भला कह सकते हैं, उसकी लानत-मलानत कर सकते हैं, निंदा-आलोचना सब कर सकते हैं कि वह हमारे मुजरिम हमें नहीं सौंप रहा। हमने सूची दे दी। सबूत दे दिए। फिर भी नहीं सौंप रहा।
पर अमेरिका का क्या करें? पाकिस्तान तो चलो शत्रु है, पर अमेरिका तो मित्र है। नया-नया मित्र है। इसलिए मित्रता की कस्में भी ज्यादा खाता है। हालांकि वह पाकिस्तान का भी मित्र है, पर उसका तो वह पुराना मित्र है। इसलिए कस्में खाने की ज़रूरत नहीं पड़ती। वैसे कहावत यह है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, पर यहां तो दुश्मन का दोस्त, दोस्त है। कहावतें ऐसे ही पुरानी पड़ती हैं और अपना अर्थ खो देती हैं।
खैर, पूछताछ करके अमेरिका ने बताया कि हेडली ने अपना जुर्म कबूल कर दिया है। उसने कबूल कर लिया है कि मुंबई के हमलों का वह मददगार था। उसने यह भी बता दिया है कि उस हमले में कौन-कौन शामिल था। पाकिस्तानी आतंकवादी तंजीमें, सेना, आईएसआई सब। हमें तसल्ली हुई। हमने कहा— लाओ अब वह मुजरिम हमें दे दो। वह सबूत है कि पाकिस्तान हमारे खिलाफ आतंकवादी गतिविधियां चला रहा है।
अमेरिका ने कहा— अरे नहीं भाई हम उसे आपको नहीं सौंप सकते। हमने कहा— अच्छा पूछताछ के लिए हम अपनी टीम भेज देते हैं। पहले तो किसी अफसरनुमा नेता या नेतानुमा अफसर ने हां कर ली, कि चलो पूछताछ कर लो, हमें क्यों इनकार होने लगा। लेकिन फिर मना कर दिया— नहीं आपको पूछताछ की इजाजत नहीं दी जा सकती।
भारत-अमेरिका से आग्रह करता रहा, निवेदन करता रहा, करबद्ध प्रार्थना करता रहा- कृपया हमें हेडली से पूछताछ करने दीजिए। वह हमारा मुजरिम है। आप समझते क्यों नहीं। जैसे आपके यहां नौ-ग्यारह का हमला था, वैसे ही हमारे यहां का छब्बीस-ग्यारह का हमला है। वह उस हमले का महत्वपूर्ण गवाह है। वह सारे सबूत दे सकता है। हम उस हमले के मुजरिमों को कठघरे में खड़ा कर सकते हैं और अंतर्राष्टï्रीय बिरादरी से उन्हें सज़ा दिलवाने की मांग कर सकते हैं।
पर अमेरिका मान ही नहीं रहा। भले लोगों ने सरकार को समझाया कि ऐसे क्यों गिड़गिड़ा रहे हो, अच्छा थोड़े ही लगता है। कुछ और लोगों का कहना है कि वास्तव में हेडली डबल एजेंट है। वह ड्रग्स अर्थात नशीले पदार्थों की तस्करी से जुड़ा हुआ था। जिसे एफबीआई ने पकड़ा और अपना एजेंट बना लिया।  उधर, वह आतंकवादी तंजीमों का भी एजेंट बन गया। तो ऐसे बंदे को एफबीआई भारत को कैसे सौंप दे? कुछ ऐसे-वैसे राज़ उसने उगल दिए तो दोनों देशों की दोस्ती पर आंच नहीं आ जाएगी। वैसे भी दोस्ती नयी-नयी हुई है। तो लगता है अमेरिका तो दोस्ती की रक्षा के लिए ही हेडली को नहीं सौंप रहा है जबकि हमें देश की रक्षा की चिंता है। इसीलिए भारत हेडली को मांग रहा है। उसे पाने के लिए आग्रह, निवेदन और करबद्ध प्रार्थना कर रहा है।


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