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आपके पत्र

Posted On April - 6 - 2010

अमिट छाप

स्नेहलता, सिरसा
वर्ष 2004 में भारतीय बाज़ार में बेस्ट सेलिंग कार रही मारुति-800 का भले ही प्रदूषण के अंतर्राष्टï्रीय मानक लगातार कड़े होने के कारण एक अध्याय खत्म हो गया हो। लेकिन बीते वक्त में यह भारतीय वैभव और सपनों का पर्याय बनी रही। भारत की कारों के इतिहास का  जब भी पुनरावलोकन होगा, मारुति-800 का ही चमचमाता इतिहास होगा। मरुति-800 भारतीय दिलों से कभी दूर नहीं हो सकती। इसने भारतीय दिलों में अमिट छाप छोड़ दी है, भले ही यह भारतीय सड़कों से दूर हो जाए।

असमानता की खाई

आरती गुप्ता, हिसार
गृहमंत्री पी. चिंदबरम ने नक्सलवादियों को कुचलने के लिए सैन्य कार्रवाई की जो मुहिम छेड़ रखी है वह शायद इसका हल नहीं है। जिन समस्याओं के उपरांत नक्सलवाद पनप रहा है उसका सबसे बड़ा कारण समाज में धन, सम्मान व रोजगार को लेकर एक बड़ी असमानता है जो समाज में एक विशेष वर्ग को अधिक प्रभावित कर रही है। समाज में व्याप्त यह असमानता की खाई दिन-प्रतिदिन गहरी होती जा रही है जिसका हल  असमानता की खाई को कम करके ही किया जा सकता है, नक्सलवादियों की भावनाओं व मांगों को दबाकर नहीं।

देश का भविष्य

शामलाल कौशल, रोहतक
28 मार्च के दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘बच्चे मांगे बालपन, पुस्तक, कॉपी, स्लेटÓ बच्चों के बालपन के यूं ही बर्बाद होने की दुखदायी दास्तान कहने वाला था। देश के लगभग आधे से कुछ कम बच्चों को तो पता ही नहीं होता कि बचपन या बालपन क्या होता है। एक-तिहाई आबादी से भी ज्यादा नारकीय जीवन व्यतीत करने वाले अति निर्धन मां-बाप के लिए अपने बच्चों को स्कूल भेजना किसी विलासिता से कम नहीं। बच्चे घरों, दुकानों, कारखानों आदि उद्योगों में अपना बचपन बर्बाद करके घर का खर्च पूरा कर रहे हैं। बेशक सरकार ने 6 से 14 साल के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून बनाया है। हर साल बच्चों के कल्याण के नाम पर खर्च की जाने वाली राशि भी इनके भविष्य को नहीं सुधार पाती। कारण परिवार का गुजारा ही मुश्किल से हो पाता है। ऐसे में देश के भविष्य ये बच्चे कैसे पढ़ पाएंगे?

दोगली नीति

डा. अशोक शर्मा, जगाधरी
चीन की बढ़ती ताकत के भय से अमेरिका ने विश्व की उभरती हुई परमाणु शक्ति भारत की तरफ मजबूरीवश मित्रता का हाथ बढ़ाया है। भारत-पाक संबंधों में जो दूरियां हैं वह चीन व अमेरिका के कारण से ही हैं। अमेरिका का कोई नेता जब भारत में आता है तो वह पाकिस्तान के विरुद्ध बोलता है और भारत की तारीफों के पुल बांधता है। जब वही नेता पाकिस्तान में पहुंचता है तो उनको करोड़ों डालर की सैनिक सहायता व गोला-बारूद देकर उसको भारत के विरुद्ध उकसाने लगता है।  परमाणु समझौते पर अमेरिका ने भारत के हस्ताक्षर तो करवा  लिए हैं मगर पाकिस्तान ने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया है जिससे साफ जाहिर है कि अमेरिका से इतनी सहायता प्राप्त करने के बावजूद पाकिस्तान उसकी थानेदारी स्वीकार नहीं कर रहा। भारत की जनता व सैनिक अधिकारी अमेरिका के दोगलेपन से वाकिफ हैं मगर हमारे देश के नेता न जाने क्यों अमेरिका के दीवाने हो रहे हैं और उसके दोगलेपर पर बिल्कुल ध्यान ही नहीं दे रहे।

अंकुश कब लगेगा

मुकेश अग्रवाल, साढौरा
देश की विभिन्न अदालतों में कुछ नेताओं पर आय से अधिक संपत्ति एकत्रित करने के मामले चल रहे हैं। किंतु अभी तक कानून एक भी नेता की संपत्ति को देश के खजाने में वापस जमा नहीं करवा पाया है। खैर, यह सिलसिला तो अब यूं ही चलता रहेगा क्योंकि नेताओं को भलीभांति पता है कि भविष्य में अदालत में केस चलने पर किस प्रकार बचाव करना है। कुछ इसी प्रकार की कहानी मध्य प्रदेश के एक मंत्री जिसके पास वर्ष 2003 में केवल 96 हजार रुपए नकद थे, किंतु 5 वर्ष बाद एक करोड़ 80 लाख रुपए नकद थे। केवल 60 महीनों में मंत्री के पास पौने दो करोड़ जैसी भारी-भरकम राशि कहां से आई? इससे स्पष्टï होता है कि देश के खजाने से जनता के खून-पसीने की कमाई किस तरह नेतागण डकार रहे हैं। हैरत की बात तो यह है कि देश में करीब पांच हजार विधायक और पांच सौ से अधिक सांसद सत्तासुख भोगते हुए अपनी चल-अचल संपत्ति को सैकड़ों गुणा अधिक करने में लगे हैं। अफसोस! उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए न कोई कानून है न सख्त नियम। आखिर इस परिपार्टी पर अंकुश कब लगेगा?


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