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आपके पत्र

Posted On April - 5 - 2010

सरकार की जिम्मेदारी

सुनील बिश्नोई, हिसार
लोककल्याणकारी सरकार का यह दायित्व है कि वह अपनी जनता को बिजली-पानी जैसी मूलभूत आवश्यकता उपलब्ध करवाए। देश में राज्य सरकारें अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाती रहती हैं। सरकारें इस समस्या की ओर ध्यान नहीं दे रही हैं और पूरे देश में बिजली के लिए हाहाकार मचा हुआ है। बिजली का यह संकट कई राज्यों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने में भी समस्या बन रहा है। बिजली को लेकर धरना-प्रदर्शन जैसी घटनाओं का सिलसिला आम देखा जा सकता है। सरकार द्वारा बिजली-पानी मुहैया कराने की नीति बनाई जाती है व घोषणा भी की जाती है। लेकिन नीति या घोषणा करने से लोगों को कब तक चुप करा पायेगी?

सवालिया निशान

सोनिका पूनिया, हिसार
महिला आरक्षण विधेयक पास होने से पहले ही उसके विरोधियों ने अपनी कमर कस ली है। महिला को समाज की जननी कहा जाता है। जब आरक्षण की बात आई तो समाज द्वारा ही इसका विरोध क्यों? महिला आरक्षण विधेयक एक सोचनीय विषय है लेकिन सवाल यह खड़ा होता है कि जब महिला ही महिला आरक्षण का विरोध करे तो संपूर्ण महिला जाति पर सवालिया निशान लग जाता है।

सराहनीय कदम

शिखा धामा, मेरठ
शिक्षा के अधिकार को कानूनी रूप प्रदान करने के लिए जो ठोस कदम केन्द्र सरकार द्वारा उठाया गया है वह निश्चय ही काबिलेतारीफ है। इस फैसले से न केवल गरीब माता-पिता व उनके बच्चों को लाभ मिलेगा बल्कि अच्छी शिक्षा पाने के सपने भी पूरे होंगे। साथ ही साक्षरता दर में भी सम्भवत: विकास देखा जा सकेगा। शिक्षा का कानून भारत जैसे विकासशील देश को विश्वस्तर पर शिक्षा के क्षेत्र में अपनी छाप छोडऩे मे भी सहायक सिद्ध होगा। किसी भी देश की आर्थिक,राजनैतिक एवं सामाजिक उन्नति के लिए शिक्षा का अहम योगदान होता है। विकसित देशों की सफलता का सबसे बड़ा कारण तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देना ही है।

ज़हर की भूख

सत्यनारायण नेहरा, हिसार
वर्तमान समय में मनुष्य को नशों की लत ने इस तरह अपने आगोश में ले लिया है कि वह इसकी लालसा मिटाने के लिए भीख जैसे माध्यम का भी सहारा ले रहा है। देश में कौन-सा ऐसा  सार्वजनिक स्थल अछूता है जहां हमारा सामना इन नशेेडिय़ों से न होता हो। ध्यानपूर्वक अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि ये भिक्षुक भोजन नहीं बल्कि अपनी नशों की भूख को शांत करने के लिए भीख मांगते हैंं। बस स्टैण्ड, रेलवे स्टेशन आदि स्थलों पर इन भिखारियों को शराब के नशे में ओछी हरकतें करते हुए साफ देखा जा सकता है। आमजन को ऐसे भिखारियों को भीख न देकर नशे को बढ़ावा नहीं देना चाहिए । उनका भला करना चाहते हैं तो उन्हें खाने-पीने की सामग्री देने तक ही सीमित रखें।

जल ही जीवन

प्रीती, सोनीपत
ज्येष्ठ के महीने से पहले ही लोगों के कंठ पानी की बूंद को तरसने लगे हैं। ऐसे में जब नलों से टपकता पानी सड़कों पर बहता नजर आता है तो पानी के प्रति लोगों की बढ़ती लापरवाही पर क्षोभ आता है। सरकार द्वारा उठाए गए सारे प्रयास विफल नजर आते हैंं। जल ही जीवन है यह बात सभी को समझकर जल संरक्षण की ओर ठोस कदम उठाने होंगे। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब पानी की एक-एक बूंद के लिए हम सब तरसेंगे और पानी का मूल्य समझेंगे।

सरस्वती-सम्मान

ओपी कौशिक, ढकोली
शिक्षण संस्थानों के आयोजनों में मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन की पावन परंपरा से जितनी खुशी व गौरव महसूस होता है उससे कहीं ज्यादा दु:ख तब होता है जब मुख्य अतिथि व अन्य इस अवसर पर जूते पहने खड़े रहते हैं। वैसे तो मंच पर भी बिना जूते विराजमान होना चाहिए। विचारधारा कोई भी हो, शिक्षा की अधिष्ठïात्री देवी मां सरस्वती का सम्मान इसी में है कि कम से कम दीप प्रज्ज्वलन के समय जूते उतारे जाएं।

अमूल्य वोट

सोहनलाल सिखवाल, इंदौर
मुंबई में भाषा व प्रांत के नाम पर लगातार विष उगलकर हिंसा को बढ़ावा देने वाली शिवसेना-मनसे की जारी गतिविधियों से देश पर उंगलियां उठना स्वाभाविक है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि शिवसेना और मनसे जैसी इंसानियत विरोधी राजनीतिक पार्टियों को जन्म लेने से पहले ही जनता अपने अमूल्य वोट से महरूम कर दे ताकि यह नासूर होता दाग देश पर न लग सके।

देश का भविष्य

शामलाल कौशल, रोहतक
28 मार्च के दैनिक ट्रिब्यून का संपादकीय ‘बच्चे मांगे बालपन, पुस्तक, कॉपी, स्लेटÓ बच्चों के बालपन के यूं ही बर्बाद होने की दुखदायी दास्तान कहने वाला था। देश के लगभग आधे से कुछ कम बच्चों को तो पता ही नहीं होता कि बचपन या बालपन क्या होता है। एक-तिहाई आबादी से भी ज्यादा नारकीय जीवन व्यतीत करने वाले अति निर्धन मां-बाप के लिए अपने बच्चों को स्कूल भेजना किसी विलासिता से कम नहीं। बच्चे घरों, दुकानों, कारखानों आदि उद्योगों में अपना बचपन बर्बाद करके घर का खर्च पूरा कर रहे हैं। बेशक सरकार ने 6 से 14 साल के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा का अधिकार कानून बनाया है। हर साल बच्चों के कल्याण के नाम पर खर्च की जाने वाली राशि भी इनके भविष्य को नहीं सुधार पाती। कारण परिवार का गुजारा ही मुश्किल से हो पाता है। ऐसे में देश के भविष्य ये बच्चे कैसे पढ़ पाएंगे?

न्यायपालिका पर भरोसा

सोहनलाल श्रृंगी, इंदौर
कुछ समय पहले तक न्यायपालिका खुले तौर पर यह स्वीकार नहीं करती थी कि प्रशासन की अन्य एजेंसियों की तरह उसमें भी भ्रष्टïाचार मौैजूद है। ऐसे गंभीर आरोप लगने से पहले ही अकसर उन्हें छिपाने के प्रयास किए जाते थे। अब जिस प्रकार निचली अदालतों में मौजूद भ्रष्टïाचार से निपटने की कोशिशें हो रही हैं उससे आम जनता की उम्मीदें और भी बढ़ गई हैं। न्यायपालिका में आम जनता का भरोसा और बढ़ गया है।

अमिट छाप

स्नेहलता, सिरसा
वर्ष 2004 में भारतीय बाज़ार में बेस्ट सेलिंग कार रही मारुति-800 का भले ही प्रदूषण के अंतर्राष्टï्रीय मानक लगातार कड़े होने के कारण एक अध्याय खत्म हो गया हो। लेकिन बीते वक्त में यह भारतीय वैभव और सपनों का पर्याय बनी रही। भारत की कारों के इतिहास का  जब भी पुनरावलोकन होगा, मारुति-800 का ही चमचमाता इतिहास होगा। मरुति-800 भारतीय दिलों से कभी दूर नहीं हो सकती। इसने भारतीय दिलों में अमिट छाप छोड़ दी है, भले ही यह भारतीय सड़कों से दूर हो जाए।


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