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अपनी डफली, अपना राग

Posted On April - 7 - 2010

हिला आरक्षण पर राजनीतिक आम सहमति की मनमोहन सिंह सरकार की एक कोशिश नाकाम हो गयी तो इसमें आश्चर्य कैसा? इस मुद्दे पर पर सोमवार को बुलायी गयी सर्वदलीय बैठक में अपेक्षा के अनुरूप सभी दल अपने-अपने घोषित और जगजाहिर स्टैंड पर अड़े रहे और बैठक बेनतीजा रही। दरअसल यह तो होना ही था, क्योंकि बिना लचीला रुख अपनाये किसी भी विवादित मुद्दे पर सहमति नहीं हो सकती और इस मुद्दे पर समर्थक और विरोधियों में से कोई भी लचीला रुख अपनाने के मूड में नहीं दिखता। लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित किये जाने के सवाल पर राजनीतिक दलों के मतभेद न तो नये हैं और न ही किसी से छिपे हैं। पिछले लगभग 14 वर्षों से महिला आरक्षण विधेयक अगर संसद में पारित होकर कानून नहीं बन पाया है तो उसकी वजह यही मतभेद हैं। इस बार मनमोहन सिंह सरकार और कांग्रेस इस बात के लिए अपनी पीठ थपथपा सकती हैं कि उसने कम से कम भारतीय संसद के उच्च सदन राज्यसभा में तो यह विधेयक पारित करा ही दिया, पर उससे क्या फर्क पड़ता है? लोकसभा में पारित हुए बिना तो यह विधेयक कानून बनने की लंबी राह पर आगे ही नहीं बढ़ सकता। लंबी राह इसलिए कि संसद के दोनों सदनों की मंजूरी के बाद भी विधेयक को देश के 14 राज्यों की विधानसभाओं द्वारा भी पारित किये जाने की जरूरत होगी।
दरअसल यह तो एक संवैधानिक और संसदीय प्रक्रिया का मसला है कि विधेयक को कानून की शक्ल लेने में कितना वक्त लगता है, लेकिन उस दिशा में प्रयासों की गंभीरता तो पूरी तरह राजनीतिक मामला है। लोकसभा और विधानसभाओं में महिला आरक्षण अगर 14 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद भी एक सपना ही बना हुआ है तो जाहिर है कि राजनीतिक दलों में इच्छाशक्ति और ईमानदारी का अभाव है। क्या यह राजनीतिक दलों की ईमानदारी और इच्छाशक्ति पर सवालिया निशान ही नहीं है कि देश के तीन बड़े राजनीतिक ध्रुवों— कांग्रेस, भाजपा और वाम मोर्चा के समर्थन के ऐलान के बावजूद महिला आरक्षण विधेयक अभी तक पारित नहीं किया जा सका है? जो भी दल सत्ता में होता है, आधी आबादी को उसका हक देने के प्रति प्रतिबद्धता तो दिखाता है, पर आम राय के नाम पर विधेयक को ठंडे बस्ते में डाल देता है। विडंबना यह है कि जिस आम राय की आड़ ली जाती है, वह बनाने की कोशिश कभी नहीं की जाती। कांग्रेस, भाजपा और वाम मोर्चा को तो महिला आरक्षण विधेयक मौजूदा स्वरूप में भी मंजूर है, लेकिन विरोध कर रहे समाजवादी पार्टी, जनता दल यूनाइटेड, राष्ट्रीय जनता दल और बहुजन समाज पार्टी इस महिला आरक्षण के दायरे में पिछड़े, अल्पसंख्यक और दलित वर्ग की महिलाओं के लिए भी पृथक आरक्षण के स्पष्ट प्रावधान की मांग कर रहे हैं। सोमवार की बैठक में एक नयी बात यह हुई है कि मनमोहन सिंह सरकार में शामिल महत्वपूर्ण घटक दल, 19 सांसदों वाली तृणमूल कांग्रेस भी विरोधियों की मांग में सुर मिलाने लगी है।
ममता का रुख तो अभी सामने आया है, पर बाकी विरोधियों का रवैया तो जगजाहिर है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि सोमवार को सर्वदलीय बैठक बुलाने से पहले ख्ुाद सरकार ने क्या होम वर्क किया? सपा,जदयू, राजद और बसपा को महिला आरक्षण विधेयक मौजूदा स्वरूप में मंजूर नहीं है। ऐसे में अगर सरकार ने बिना किसी वैकल्पिक प्रस्तावों के ही सर्वदलीय बैठक बुलायी तो इसका अर्थ यही है कि कोशिश सहमति बनाने की नहीं, महिला मतदाताओं को यह संदेश देने भर की है कि हम तो आरक्षण के लिए प्रतिबद्ध हैं, पर विरोधी नहीं मान रहे। खास बात यह है कि कोई भी दल महिला आरक्षण के विरोध में नहीं है, विरोध आरक्षण के प्रतिशत या तरीकों को लेकर ही है। ऐसे में तो सहमति मुश्किल नहीं होनी चाहिए। सोमवार को तो वाम मोर्चा ने भी कह दिया कि अगर सरकार महिला आरक्षण के अंदर पिछड़ी, अल्पसंख्यक और दलित महिलाओं को भी पृथक आरक्षण का प्रावधान करती है तो उसे आपत्ति नहीं। उधर मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने भी कहा है कि अगर सरकार चुनाव आयोग के फॉर्मूले के मुताबिक 33 प्रतिशत टिकट महिलाओं को देने की जिम्म्ेादारी राजनीतिक दलों  पर डालना चाहे तो उस पर भी विचार किया जा सकता है। जाहिर है, विकल्प कई हैं। बेशक लोकतंत्र में फैसले सहमति से ही लिये जाने चाहिए। अगर अन्य विकल्पों के जरिये महिला आरक्षण पर आम सहमति बन सकती है तो सरकार को उन पर विचार करना चाहिए, न कि हठधर्मी रवैया अपनाते हुए विधेयक को अनिश्चितकाल के लिए ठंडे बस्ते में चले जाने देना चाहिए।


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