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विपक्ष के बिना बजट सत्र

Posted On March - 10 - 2010

लोकतंत्र में आस्था रखने वाला कोई भी व्यक्ति इस बात पर आहत ही महसूस करेगा कि हरियाणा विधानसभा से विपक्षी सदस्यों को बजट सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित कर दिया गया । असहमति लोकतंत्र का अहम तत्व है और विपक्ष जीवंत संसदीय लोकतंत्र के लिए अनिवार्यता। इसलिए निलंबन, और वह भी पूरे सत्र के लिए, सरीखे अतिवादी कदमों से बचा ही जाना चाहिए। जिस मुद्दे पर यह निलंबन किया गया है, वह तो और भी गंभीर है। मुख्य विपक्षी दल इंडियन नेशनल लोकदल के नेता ओमप्रकाश चौटाला और भाजपा विधायक दल के नेता अनिल विज ने महंगाई के मुद्दे पर चर्चा के लिए काम-रोको प्रस्ताव का नोटिस दिया था। इसलिए सोमवार को प्रश्नकाल समाप्त होते ही विज ने अपने काम-रोको प्र्रस्ताव के नोटिस की स्थिति जाननी चाही। तब विधानसभा अध्यक्ष हरमोहिंदर सिंह चठ्ठा ने उन्हें बताया कि उनका नोटिस इसलिए अस्वीकार कर दिया गया है, क्योंकि ठीक वैसा ही नोटिस इनेलो की ओर से भी आया था, जिसे ध्यानाकर्षण प्रस्ताव में तबदील कर मंगलवार की कार्यवाही में शामिल करने के लिए रख लिया गया है। इसलिए मंगलवार को होने वाली चर्चा में वह अपने विचार रख सकते हैं। अनिल विज विधानसभा अध्यक्ष के इस तर्क से सहमत नहीं हुए और अपने एक साथी कृष्णपाल गुर्जर के साथ अध्यक्ष के आसन तक पहुंच गये। उसी समय इनेलो के भी अशोक अरोड़ा और रामपाल माजरा समेत कई सदस्य अध्यक्ष के आसन के सामने पहुंच गये और महंगाई पर चर्चा कराने की मांग करने लगे, जबकि सत्तापक्ष राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा कराना चाहता था। इसी हंगामे के बीच सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी गयी। स्थगन के बाद कार्यवाही शुरू होने पर भी हंगामा  होता रहा।
अध्यक्ष ने विपक्षी नेताओं को अपने कार्यालय में बुलाकर भी सदन की कार्यवाही चलने देने की नसीहत दी और काम-रोको के बजाय काम-करो प्रस्ताव लेकर आने के जुमले भी उछले, पर अंतत: हंगामा जारी रहा और उसी बीच संसदीय कार्यमंत्री रणदीप सुरजेवाला ने विपक्षी सदस्यों को बजट सत्र की शेष अवधि के लिए निलंबित करने का प्रस्ताव पेश किया जो शोर-शराबे के बीच ही ध्वनिमत से पारित भी कर दिया गया। घटनाक्रम से भी जाहिर है कि विपक्ष राज्यपाल के अभिभाषण पर चर्चा से पहले महंगाई पर चर्चा कराना चाहता था। अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा एक संसदीय परंपरा है,जबकि महंगाई आम आदमी के जीवन को सीधे प्रभावित करने वाली एक ज्वलंत समस्या है। सदन संचालन विधानसभा अध्यक्ष का दायित्व है। इसलिए कई बार कुछ परिस्थितियों में सख्त रवैया अख्तियार करना भी उनकी मजबूरी होती है, पर समूचे विपक्ष को ही शेष सत्र की अवधि के लिए निलंबित कर देना ऐसा आभास देता है कि जो कदम सबसे अंत में उठाया जाना चाहिए था, वह सबसे पहले उठा लिया गया है। ध्यान रखना चाहिए कि यह सत्र भी सामान्य नहीं है। यह विधानसभा का बजट सत्र है, जिसमें वर्ष 2010-11 के लिए राज्य के बजट को मंजूरी दी जानी है। विधानसभा में इनेलो के 31, भाजपा के चार, अकाली दल और हजकां के एक-एक सदस्य हैं, लेकिन सोमवार को विधानसभा की कार्यवाही में उपस्थित न होने के कारण भाजपा की कविता जैन और हरियाणा जनहित कांग्रेस के कुलदीप बिश्रोई ही इस निलंबन से बच पाये हैं।
ऐसे में सबसे अहम और स्वाभाविक सवाल यह है कि विपक्ष को निलंबित कर सरकार क्या बिना बहस ही बजट पारित करा लेना चाहती है? बेशक सत्तापक्ष के सदस्यों के जरिये भी बहस की औपचारिकता पूरी की जा सकती है, पर औपचारिकताओं से लोकतंत्र मजबूत नहीं बनता। बजट राज्य के बहुआयामी विकास की प्राथमिकताएं और दिशाएं तय करता है। अगर उसमें विपक्ष की राय शामिल नहीं होगी, संदेश हरगिज नहीं जायेगा। ऐसा नहीं है कि इससे पहले किसी राज्य में बिना बहस के बजट पारित नहीं हुआ होगा। दरअसल ऐसे निराशाजनक क्षण संसद में भी आये हैं, पर प्रेरणा हमेशा अच्छे उदाहरणों से ली जानी चाहिए। उन्हीं का अनुकरण किया जाना चाहिए। हरियाणा विधानसभा के अध्यक्ष और शायद सरकार ने भी यह भुला दिया कि भारतीय संसद ने भी अपने इसी बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा की परंपरा का निर्वाह करने से पहले महंगाई पर चर्चा की। हरियाणा विधानसभा भी ऐसा कर सकती थी। संभव है कि इसके चलते विधानसभा सत्र की अवधि कुछ बढ़ानी पड़ती, पर बजट सत्र में विपक्ष की मौजूदगी और सहभागिता से संसदीय लोकतंत्र को मजबूती मिलती।


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