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वार्तालाप जारी रखना कूटनीतिक मजबूरी

Posted On March - 9 - 2010

अवधेश कुमार

भारत-पाक वार्ता

भारत एवं पाकिस्तान के विदेश सचिवों के बीच बातचीत पर लोकसभा में राजग के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी एवं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जुगलबंदी काफी रोचक थी। आडवाणी ने यदि अमेरिकी दबाव का आरोप लगाया तो प्रधानमंत्री ने इसे निराधार बताया है। किंतु इससे देश मेे उठ रहे सारे प्रश्नों का समाधान नहीं हुआ है। निस्संदेह, पाकिस्तान के साथ विदेश सचिव स्तर की बातचीत का जो सार्वजनिक परिणाम आया है उसे देखते हुए उन लोगों का पक्ष मजबूत हुआ जान पड़ता है जो बातचीत का विरोध कर रहे थे। आखिर जब बातचीत का भारत की दृष्टि से कोई सार्थक परिणाम आना ही नहीं है, जब पाकिस्तान आतंकवाद पर हमारी बात से सहमत ही नहीं, उल्टे बलूचिस्तान जैसा नया एजेंडा जोडऩे पर उतारु है तो बातचीत का अर्थ क्या है? वास्तव में 14 महीने बाद भारत और पाकिस्तान के विदेश सचिव आमने-सामने अवश्य बैठे, हैदराबाद हाउस में तीन घंटे तक बातचीत हुई, पर प्रतिक्रियाएं देख लीजिए, एक-दूसरे के प्रति विश्वास और सद्भाव की बात तो दूर, सामान्य राजनयिक सम्मान भी अनुपस्थित। हमारी विदेश सचिव निरुपमा राव ने बातचीत के तुरत बाद अवश्य कहा कि दोनों पक्षों ने पारदर्शिता और अच्छे रसायन (गुड केमिस्ट्री) में बातचीत की लेकिन पाकिस्तान के विदेश सचिव सलमान बशीर ने तल्ख अंदाज में भारत के रवैये की ही आलोचना कर दी। आतंकवाद के मामले पर तो उन्होंने भारत को उपदेश न देने तक की नसीहत दे दी। इसमें कोई भी यह प्रश्न उठा सकता है कि तू-तू मैं-मैं के लिए बातचीत करना कहां की बुद्धिमानी है? हम उस पाकिस्तान से क्यों बातचीत करें जो खुले दिल की बजाय पहले से भारत को नीचा दिखाने का मन बनाए हुए है?
इनका उत्तर ढूंढऩे के लिए हम यह समझें कि आखिर पाकिस्तान से इस समय हम क्या चाहते हैं? हमारी प्रमुख मांग सीमा पार आतंकवाद पर नकेल के लिए ठोस कदम उठाने की है। भारत के एजेंडे में मुंबई हमले के आठ दोषियों हाफिज सईद, सज्जाद मीर, मेजर इकबाल, मेजर समीर अली, मोहम्मद अमजद खान, अबू हम्जा, मुजम्मिल, इलियास कश्मीरी जिसका संबंध हेडली से स्थापित हो चुका है, पुणे विस्फोट के संदिग्ध रियाज और इकबाल सहित इंडियन मुजाहिद्दीन के 17 तथा सात खालिस्तान आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई करना सबसे ऊपर है। पहले भारत आतंकवादियों को सौंपने की मांग करता था, लेकिन अब इसने कहा है कि जिन पाक नागरिकों को वह सौंप नहीं सकता उनके खिलाफ विश्वसनीय कानूनी कार्रवाई करे, एवं शेष को सौंप दे। दुनिया में कोई भी भारत के रुख को गलत नहीं कह सकता। किंतु पाकिस्तान कश्मीर को मूल मुद्दा बताते हुए सियाचिन, बलूचिस्तान और सर क्रीक पर बातचीत करने पर अड़ता है। जले पर नमक छिड़कने का रवैया यह है कि आतंकवाद पर ज्यादा जोर न दिया जाए। जिस हिकारत भरे अंदाज में बशीर ने हाफिज सईद पर भारत के दस्तावेज को सबूत की बजाय एक साहित्य करार दिया उससे आपत्तिजनक कुछ नहीं हो सकता। सईद ने अपने साक्षात्कार में स्वयं को निरपराध साबित करने के लिए इसी का हवाला दिया है।
यह स्वीकारना होगा कि बातचीत एवं उसके बाद बशीर का रवैया साउथ ब्लॉक की उम्मीदों के विपरीत था। हालांकि बातचीत के बाद संयुक्त संवाददाता सम्मेलन आयोजित न करने का निर्णय पहले से था, जिसे पाकिस्तान ने पसंद नहीं किया होगा, पर हमारी भूमि पर ऐसी तीखी प्रतिक्रिया राजनय की मर्यादा में नहीं आती। अंतत: भारत को भी कड़े तेवर में प्रत्युत्तर देने की आवश्यकता महसूस हुई। अगर बातचीत नहीं होती तो यह नौबत आती ही नहीं। भारत ने कहा कि बातचीत का 85 प्रतिशत हिस्सा आतंकवाद पर केन्द्रित रहा, जबकि पाकिस्तान कहता है उसने एक मुद्दे को केन्द्रित करने का विरोध किया एवं कश्मीर के साथ जल विवाद एवं बलूचिस्तान में अलगाववाद को भी एजेंडे में लाया। ऐसी हालत में सद्भावपूर्ण माहौल बन ही नहीं सकता था। तो क्या बातचीत का रास्ता फिलहाल पूरी तरह बंद कर दिया जाए? इसका उत्तर भी इस प्रतिप्रश्न में ढूंढऩा चाहिए कि बातचीत न करके हम क्या पा लेंगे? यकीनन हमारे लिए आतंकवाद सबसे बड़ा मुद्दा है। मुंबई के बाद पुणे के तार भी पाकिस्तान से जुड़ रहे हैं, और काबुल में 26 फरबरी को भारतीयों पर जो हमला हुआ उसका स्रोत भी पाकिस्तान में होना निश्चित है। पहली बार इतने प्रमुख भारतीय हमले में मारे गए हैं। जब तक पाकिस्तान की जमीन पर जारी भारत विरोधी आतंकवाद का अंत नहीं होता, भारत को निशाना बनाए जाने की कोशिशें चलती रहेंगी। भारत की जगह कोई भी देश होता तो उसकी प्राथमिकता आतंकवाद ही होता। जान पर आफत आने के बाद अन्य प्राथमिकताएं तब तक नेपथ्य में चली जाती हैं जब तक कि अपनी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जाती। अगर पाकिस्तान ईमानदार होता तो वह आसानी से भारत की मनोदशा समझ लेता और तब उसका व्यवहार बिल्कुल ऐसा नहीं होता। आतंकवाद के संबंध में अमेरिका एवं भारत के साथ उसके व्यवहार में साफ अंतर है। इसे किसी भी दृष्टिकोण से नेकनीयत तो नहीं ही कहा जा सकता है। संभव है अफगानिस्तान पर लंदन सम्मेलन में थोड़ी तरजीह मिलने से पाकिस्तान इस गलतफहमी का शिकार हो गया हो कि अब उसकी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठïा बढ़ रही है, अन्यथा बातचीत आरंभ करने के लिए अकुलाहट उसकी ओर से ही प्रदर्शित हो रही थी। उसको तरजीह मिली तो केवल इस कारण कि अफगानिस्तान में आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध का एक बड़ा पक्ष वही है, क्योंकि उसकी धरती ही आतंकवादियों के विचार, भर्ती, प्रशिक्षण व संसाधनों का मुख्य केन्द्र है और उसे साथ लिए बिना युद्ध में सफलता नहीं मिल सकती।
लेकिन बातचीत न करके भी हम कुछ नहीं पा सकते। यह बिल्कुल सही है कि पाकिस्तान अगर आतंकवाद से लहूलुहान है तो इसके पीछे दोष उसका है, क्योंकि यह उसका पैदा किया हुआ है। किंतु इस समय वह दुनिया में आतंकवाद से सर्वाधिक पीडि़त देश है, यह कटु सच है। अब पाकिस्तान सरकार एवं वहां के प्रभावी बुद्धिजीवियों को भी यह बात समझ में आ रही है कि आतंकवाद का खात्मा नहीं हुआ तो सर्वनाश निश्चित है। परंतु भारत को लेकर जो ऐतिहासिक विकृत ग्रंथि है वह बहुत हद तक कायम है। आईपीएल में पाकिस्तानी खिलाडिय़ों की नीलामी न होने से लेकर बातचीत के कुछ समय पूर्व तक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री के खीझ भरे वक्तव्यों से माहौल बिगड़ा ही हुआ था। इसमें मौजूदा बातचीत से किसी ठोस परिणाम की उम्मीद थी भी नहीं। किंतु सब कुछ के बावजूद यह मानना होगा कि उसकी भूमि से भारत विरोधी आतंकवाद पर नकेल लगाने के लिए भी बातचीत ही करनी होगी। आखिर 13 दिसंबर 2001 को संसद पर हमले के एक लंबे अंतराल के बाद भी हमने अंतत: बातचीत की एवं जनवरी 2004 में पाकिस्तान आतंकवाद को प्रमुख एजेंडा मानने को राजी हुआ। न तो हमें बातचीत के लिए उतावलापन दिखाने या भावुक होने की आवश्यकता है और न ही समग्र वार्ता फिर से शुरू करने की उसकी कवायदों से प्रभावित होने की। पाकिस्तान की पृष्ठभूमि, उसके सत्ता समीकरण में सेना एवं राजनीति के बीच अनवरत द्वंद्व, आंतरिक राजनीति में कट्टरपंथी एवं भारत विरोधी तत्वों की प्रभावी उपस्थिति आदि को देखते हुए हमे एकाएक उससे सदाशयतापूर्ण व्यवहार की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। हां, भविष्य में आने वाली असभ्य प्रतिक्रियाओं का माकूल जवाब देने के लिए हमें तैयार रहना होगा।


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