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रहिमन चुप रहिए

Posted On March - 11 - 2010

सागर में गागर

जसविंदर शर्मा
यदि आप अपने वैवाहिक जीवन में शांति चाहते हैं तो वही करो जो आपकी पत्नी कहे। यह किसी विवाह विशेपज्ञ की नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट की नेक सलाह है। जस्टिस काटजू तथा जस्टिस दीपक वर्मा की अवकाशकालीन बैंच ने कहा है कि पत्नी जो बोलती है वह सुनो अन्यथा आप मुसीबत में पड़ सकते हैं और फिर पत्नी से तकरार करके आप अदालत की शरण में जाएंगे मगर वहां भी आपको कोई न्याय नहीं मिलेगा क्योंकि उच्चतम न्यायालय में बैठे सयाने व अनुभवी जजों का कहना है कि वे सब इस मामले में भुक्तभोगी हैं तथा कोई फैसला करने में अक्षम हैं।
चंडीगढ़ के एक पत्नी-पीडि़त व्यक्ति का अपनी पत्नी से झगड़े का मामला पिछले सोलह बरस से अदालतों में चल रहा है। हाई कोर्ट ने उस व्यक्ति को अपनी पत्नी को दस लाख रुपए मुआवजा देने का सजा सुनाई। वह व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट चला गया मगर वहां उसे न्याय की बजाय यह भापण सुनने को मिला। न्यायाधीश ने नम आंखों से उसे सलाह दी कि भाई और किसी की सुनो या न सुनो मगर पत्नी का कहा तुम्हारे लिए ब्रह्मï-वाक्य होना चाहिए। अदालत ने द्रवित होकर कहा,’ यदि आपकी पत्नी कहे कि सिर उधर घुमाओ तो तुम सिर उसी तरफ घुमाओ और यदि वह कहती है कि इधर करो तो भाई चुपचाप इस तरफ कर लो। Ó एक हिन्दी गाना भी यही सलाह देता है – जो तुमको हो पसन्द वही बात कहेंगे। तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे।
आज हमारी अदालत हर मामले में पस्त दिखाई देती है। कुछ समय पहले बिहार के चारा घोटाले के केस मेें अदालत ने ऐसे ही माथा पीटते हुए कहा था कि हमारा बस चले तो इन रिश्वतखोरों को खम्भे से बांधकर उल्टा लटका दें। हाय रे मजबूरी ! सच सामने होते हुए भी अदालत अपना फैसला नहीं दे सकती।
पश्चिम बंगाल के पोस्ट ऑफिस के एक बाबू भोलाराम से अदालत ने एक मासूम सवाल किया है, ‘भोला, तू पहले क्यों नहीं बोला?Ó कुछ समय पहले भोलाराम ने अदालत में अर्जी लगाई थी कि उसकी पत्नी पिछले दस बरसों से उसे बुरी तरह पीटती आ रही है। अदालत ने भोलाराम की सारी बातें स्वीकार कर ली मगर उसके गले यह बात नहीं उतरी कि अब क्यों? पहले क्यों नहीं। केस अटका हुआ है। कोर्ट जाकर बेचारा भोला पहले ही जग-हंसाई सह रहा है और ऊपर से यह सवाल उसे परेशान कर रहा है कि भोला, तू पहले क्यों नहीं बोला।
भोला एक शरीफ आदमी है और शरीफ आदमी की खास बात यह होती है कि पानी सिर से भी गुजर जाए, तब भी वह नहीं बोलता। वह सोचता रहता है कि वह पहले मुंह क्यों खोले? कहीं कुछ हो गया तो? नौकरी पर आंच तो नहीं आएगी। बच्चे क्या सोचेंगे। पड़ोसी उसे बिंदास कहेंगे। साथ काम करने वाले उसे कहेंगे कि, भाई बहुत बोलता है तू, मस्त रहा कर, क्यों बेकार की मुसीबत मोल लेता है, अपने काम से काम रखा कर। शरीफ आदमी यही सब सोचकर नहीं बोलता। वह इसलिए भी नहीं बोलता क्योंकि बोलने से कुछ होगा नहीं। देश का पतन हो चुका है। कोई आस-उम्मीद नहीं है अब।
भोलाराम भी किसी चमत्कार की उम्मीद में दस सालों तक पत्नी की मार खाता रहा। वह पहले इसलिए नहीं बोला क्योंकि पहले पिटाई के साथ-साथ उसे अन्य सुविधाएं भी मिल रही थीं, जैसे बर्तन धोने के लिए गर्म पानी और नींबू-युक्त विम, कपड़े धोने के लिए सेमी-आटोमैटिक मशीन, पौछे के लिए गेंडा-ब्रांड फिनायल आदि। पत्नी मारती थी तो प्यार भी तो वही करती थी। अब मारने का अधिकार सिर्फ उसी को है जो प्यार करता है। मारते-मारते कभी भोला की कोहनी या पीठ सूज जाती तो प्यार से सिंकाई भी तो पत्नी ही करती थी।
पिछले कुछ महीनों से भोलाराम की पत्नी के व्यवहार में अन्तर आ गया था। उसकी स्नेह-धारा सूख गई। भोलाराम मार भी खाता था तथा ठंडे पानी से ढेरों जूठे बर्तन भी धोता था। शायद भोलाराम ने प्रतिवाद करनाशुरू कर दिया था। दोहरी मार से भोला तंग आ गया। मार तो खा ही रहा था, सुविधाएं भी छिन गई। वह कोर्ट चला गया। एक समझदार आदमी को अपने घर में अपनी पत्नी से बहस नहीं करनी चाहिए। आदमी सारी दुनिया से लड़ ले मगर घर में दाखिल होने से पहले अपने घर की दहलीज पर सारे हथियार रखकर घर में घुसे। अब तो इस सच पर अदालत की मुहर भी लग गई है।


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