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मुजाहिदीन के खतरनाक मंसूबे कुचलना ज़रूरी

Posted On March - 11 - 2010

राष्ट्र-चिंतन

विष्णुगुप्त
हम बाहरी और आयातित आतंकवाद का तो सफाया करने में सफल हो सकते हैं और उनके खतरनाक मंसूबों को भी कुचला जा सकता है। पाकिस्तान संरक्षित और आयातित आतंकवाद को  कुचलने में काफी हद तक हमें सफलता भी मिली है और कश्मीर को हड़पने के उसके नापाक इरादे सफल भी नहीं हुए हैं। पर आंतरिक आतंकवाद की जड़ों को कुचलना आसान नहीं होता है। इसलिए नहीं कि आंतरिक आतंकवाद की विभीषिका कोई अपराजय होती है। इसलिए कि आंतरिक आतंकवाद की जड़ों को कुचलने की राह में कई अटकलें और रोड़े होते हैं जो आंतरिक राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक विसंगतियों पर आधारित होते हैं। इंडियन मुजाहिदीन नामक आतंकवादी संगठन आंतरिक आतंकवाद का ही प्रतिनिधित्व करता है। यह सही है कि इंडियन मुजाहिदीन भी पाकिस्तान की आतंकवादी मानसिकता से निकला मजहबी संगठन है पर उसने अपने आपको ‘इंडियन’ परिधि की नीति में बांध रखा है। बटला हाउस कांड में इंडियन मुजाहिदीन की संलिप्तता उजागर हो चुकी है और उसके खतरनाक मंसूबों की क्रमबद्ध सच्चाइयां बाहर आ रही हैं। दिल्ली में सिलसिलेवार बम विस्फोटों, जयपुर बम विस्फोट कांड और उत्तर प्रदेश में हुए अधिकतर बम विस्फोटों में इंंडियन मुजाहिदीन की प्रमाणित संलिप्तता रही है। हाल के दिनों में इंडियन मुजाहिदीन के कई खतरनाक आतंकवादी पकड़े गये हैं। इसमें दिल्ली पुलिस की भूमिका की तारीफ करनी चाहिए। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि इंडियन मुजाहिदीन की जड़ें सही में उखड़ गयी हैं। इंडियन मुजाहिदीन ने बंगलादेश, पाकिस्तान और नेपाल में अपनी जडं़े मजबूत कर रखी है और इन्हीं देशों से भारत में आतंकवादी हमले कराने की साजिश चलती रहती है।
यह आर्थिक या फिर राजनीतिक प्रश्न कदापि नहीं है। यह निश्चित प्रश्न मजहबी है। मजहबी आईने में ही इस प्रश्न को देखा जाना चाहिए। पर अब तक कथित उदारवादी परम्पराएं यह मानने के लिए तैयार ही नहीं होतीं कि यह मानसिकता मजहबी है। कथित तौर पर उदारवादी परम्पराएं और मानसिकताएं यह मानती हैं कि आर्थिक विषमता और राजनीतिक-सामाजिक बेईमानी के कारण ही ऐसी मानसिकता और परम्पराएं बढ़ती हैं जो खतरनाक परिणाम के लिए दोषी हैं। हिन्दू सांप्रदायिकता और हिन्दू कट्टïरवाद भी ऐसी मानसिकता के लिए खाद और पानी हैं। यह समानता से परिपूर्ण सोच नहीं हो सकती है। बल्कि इस तरह संरक्षणवादी नीति से आतंकवादी मानसिकता बढ़ती है। हमारे देश में जो आतंकवाद की फसल लहरा रही है और प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में निर्दोष जिंदगियां शहीद होती हैं, इसके लिए जिम्मेदार कथित तौर पर उदारवादी और धर्मनिरपेक्ष तबका भी है। सच तो यह है कि हिन्दुत्व की आलोचना करना एक फैशन हो गया है। यह स्थापित हो गया है कि जो शख्सियत हिन्दुत्व को जितना गाली देगी, जितनी आलोचनाएं करेगी वह शख्सियत उतनी ही धर्मनिरपेक्ष समझी जायेगी। दुकानदारी भी इसे कह सकते हैं। बड़ी-बड़ी शख्सियत की जि़ंदगी भी इसी दुकानदारी से चलती है। बटला हाउस कांड पर धर्मनिरपेक्ष मानसिकता ने कैसी दुकानदारी चलायी थी, यह जग-जाहिर है। दिल्ली पुलिस की बहादुरी की खिल्ली उड़ायी गयी। फर्जी मुठभेड़ बताकर कहानियों पर कहानियां गढ़ी गयीं। बटला कांड पर सुप्रीम कोर्ट भी दिल्ली पुलिस को क्लीनचिट दे चुका है फिर भी कथित धर्मनिरपेक्षता की मुस्लिम-परस्त राजनीति समाप्त नहीं हो रही है।
इंडियन मुजाहिदीन की मुख्य मजहबी नीति है क्या? खुद इंडियन मुजाहिदीन के सरगनाओं के बयान हैं कि वे भारत में मुसलमानों के साथ हो रही आर्थिक या फिर राजनीतिक बेईमानी के खिलाफ लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं बल्कि उनकी लड़ाई तो भारत में इस्लामिक सत्ता व्यवस्था कायम करने को लेकर है। इंडियन मुजाहिदीन कहता है कि उसे भारत में इस्लामिक व्यवस्था कायम करने के लिए एक मुहम्मद गौरी चाहिए। उन्हें वही मुहम्मद गौरी चाहिए जिसने भारत पर 16 बार आक्रमण किया था और भारत की अस्मिता को रौंदा था। इतना ही  नहीं बल्कि मुस्लिम सत्ता भी मुहम्मद गौरी ने स्थापित की थी। अंग्रेेजों के आने के बाद भारत में मुस्लिम सत्ता का अवसान हुआ और आजादी मिलने के बाद लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम हुई। वर्तमान भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था धर्मनिरपेक्ष है। सभी धर्मो को आगे बढऩे और अपनी संस्कृति को संरक्षित करने या फिर विकसित करने की छूट है। भारत में इस्लाम फला-फुला। इस्लाम के विकास में कहीं से कोई रुकावट भी नहीं हुई। फिर भी वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था की जगह इस्लामिक व्यवस्था की मांग का अर्थ क्या हो सकता है? इसके पीछे की मानसिकता कैसी होगी? इसके दुष्परिणाम क्या होंगे? सबसे बड़ी बात तो यह है कि क्या हम इंडियन मुजाहिदीन जैसे विभाजनकारी और खूनी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हैं? उत्तर कदापि नहीं। इंडियन मुजाहिदीन के खतरनाक मंसूबों को कुचलने में हमारी राजनीतिक-सामजिक और मजहबी विसंगतियां हैं जिन्हें तोडऩे की कहीं से कोई उम्मीद भी तो नहीं दिखती है।
आखिर इंडियन मुजाहिदीन जैसे सभी आतंकवादी संगठनों के खूनी पंजों को मरोडऩे में राजनीतिक, सामाजिक विसंगतियां क्या हैं? वास्तव में हमारे देश में वोट की राजनीति के कारण राष्टï्र की अस्मिता के साथ खिलवाड़ होता रहा है और मुस्लिम आतंकवाद को संरक्षण मिलता रहा है। बटला हाउस कांड में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के मुस्लिमों की संलिप्तता जाहिर हुई। आजमगढ़ आतंकवाद की शरणस्थली ही नहीं बल्कि कारखाना है। आजमगढ में आतंकवाद की जड़ों को खंगालने और उसे नेस्तनाबूद करने की जगह संरक्षण दिया जा रहा है। वर्तमान राजनेताओं की आजमगढ़ की वोट-यात्रा क्या किसी से छिपी हुई बात है? आजमगढ़ में उन्होंने जिस तरह की तान छेड़ी उससे क्या हम आतंकवाद से लड़ सकते हैं? कुछ राजनीतिक दलों को यह मालूम है कि उनकी सत्ता का स्थायीकरण तभी संभव है जब मुस्लिम समुदाय का एकपक्षीय रुझान उसके पक्ष में जाये। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट से मुस्लिम समुदाय की नाराजगी भी दूर हुई है। पिछड़ी और दलित जातीय राजनीतिक पार्टियां कभी मुस्लिम वोटों की खरीददार थीं। अब वे खुद हाशिये पर खड़ी हैं या फिर आज की राजनीतिक सत्ता संतुलन की परिधि से बाहर हैं। आज की तारीख में कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक का थोकखरीदार है और मुस्लिम समुदाय भी कांग्रेस के साथ खड़ा है। ऐसी स्थिति में आतंकवाद पर अंकुश लग ही नहीं सकता है।
राष्टï्र सर्वोपरि है। राष्टï्र की अस्मिता के साथ खिलवाड़ होना ही नहीं चाहिए। वोट की राजनीति पर राष्टï्र की अस्मिता के साथ समझौता करना खतरनाक राजनीति है। कालांतर में हम इसके परिणाम से दो-चार हो चुके हैं। इंडियन मुजाहिदीन की आतंकवादी चुनौती को गंभीरता से क्यो नहीं लिया जा रहा है? इंडियन मुजाहिदीन भारत में इस्लामिक व्यवस्था कायम करना चाहता है। इसलिए उसके साथ किसी भी प्रकार की नरमी बरतने का मतलब क्या है? यह सही है कि राजनीतिक बंदिशों के बाद भी इंडियन मुजाहिदीन के बड़े-बड़े सरगना पकड़े गये हैं और वे जेलों में कानूनी बंधन में कैद हैं। लेकिन उसकी जड़ें न तो समाप्त हुई हैं और न ही कमजोर हुई हैं। नेपाल, पाकिस्तान और बंगलादेश में बैठकर इंडियन मुजाहिदीन के सरगना भारत में आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने की साजिशें रचने में लगे रहते हैं। इंडियन मुजाहिदीन के खिलाफ कठोर राजनीतिक नीति की जरूरत है। गुप्तचर व्यवस्थाओं को मजबूत करने के साथ ही साथ कानूनी घेरेबदी को भी मजबूत करना होगा तभी इंडियन मुजाहिदीन की खतरनाक शरीयत चुनौतियों को नेस्तनाबूद किया जा सकेगा।


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