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भूख से किसी की मौत न हो

Posted On March - 11 - 2010

खाद्यान्न नीति

तरसेम गुजराल
देश भर के राजनीतिज्ञ, ब्यूरोक्रेट, मुख्यधारा के अर्थशास्त्री अचानक नींद से जागते हैं और नींद में चलने वाले किसी मरीज की तरह बड़बड़ाने लगते हैं कि भारत एक बड़ी अर्थशक्ति बनने वाला है। लगभग पैंतालीस रुपये किलो चीनी खरीदकर, सत्तर-पचहत्तर रुपये किलो दाल और सत्रह रुपये आटा खरीदने वाली मजबूर जनता के लिए आर्थिक शक्ति होने के क्या मायने हैं? यह कष्टïों-दिक्कतों के कीच में पैर बचा-बचाकर चलने वाले आम आदमी से बेहतर कोई  नहीं जान सकता। त्रासदी तब और भी भयंकर हो जाती है जब कृषि मंत्री शरद पवार चीनी की बढ़ी कीमतों और कम उपलब्धता को शूगर के मरीजों के लिए बेहतर बताते हैं और दूसरी तरफ उड़ीसा के बालांगीर जि़ले में भूख से मौत की खबर सामने आती है। लोग उपलब्ध आय और बढ़ी हुई कीमतों की रस्सी पर अपने को गिरने से बचाने के लिए सांंस तक रोके हुए हैं और राजनीतिज्ञ इस चिंता से अनजान बेगाने से नजर आते हैं।
राज्य के रेवेन्यू मंत्री ने इस खबर से ही इनकार कर दिया है कि वहां भूख से मृत्यु हुई है। जि़ला क्लेक्टर लोकतांत्रिक राजनीति से अंतरंग नहीं थे, इसलिए कह दिया कि मरने वाले को मृत्यु से पहले दस हज़ार रुपया दे दिया था। मीडिया खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की इस वक्त की मुख्य चिंता गरीबी, भूख से होने वाली मौत या खाद्यान की कमी, किसानों की आत्महत्याओं  का सिलसिला नहीं है। कैमरे की आंख और बयान क्रिकेट, फिल्मी हस्तियों, सेक्स-स्कैंडलों और जीवन गति को पीछे ले जाने वाले बाबाओं पर ही केंद्रित है।
हमें देश को बड़ी आर्थिक शक्ति ही नहीं सीधे शब्दों में अमेरिका बनाने का संकल्प दिया जा चुका है। झूठा इंडिया शाइनिंग पहले ही मुंह के बल गिर चुका है। अब तमाम नीतियां कार्पोरेट सेक्टर को केंद्र में रखकर बनाई जा रही हैं। इन नीतियों में किसान, मजदूर, छोटे दुकानदार छोटी-मोटी नौकरी कर पेट पालने वालों को अपने हाल पर छोड़ दिया गया है। अर्थव्यवस्था को निभना रुपये के साथ है परंतु ध्यान में डालर है। शशि थरूर कहते हैं भारत प्रतिवर्ष दो खरब डालर की अमीरी प्राप्त कर रहा है। भारत के विदेशी स्रोत एक सौ चालीस बिलियन डालर तक बढ़ गए हैं। लेकिन ध्यान रहे कि देश को इसके लिए अपना सोना लंदन में गिरवी रखना पड़ा है क्योंकि विदेशी विनिमय प्रस्तावों के लिए जरूरी था। संसार के अरबपतियों की सूची में सत्ताइस भारतीय सबसे धनी व्यक्तियाां में हैं जिनमें से अधिसंख्य भारत में हैं और हमारे देश के निर्धन गरीबी रेखा से नीचे गुजर कर रहे हैं। 250 मिलियन भारतीय ऐसी दयनीय स्थितियों में गुजर-बसर करने पर विवश हैं जो हमारे लिए हर तरह से कलंक है। यह स्थिति बहुत गंभीर है।
इसमें दो राय नहीं कि सोवियत संघ के विघटन तथा समाजवाद की जगह पूंजीवादी वर्ग का जीत की खुशी में दमगजे मारना हमारे भविष्य के स्वप्न को भी तोड़-मरोड़ गया। कल्याणकारी राज्य का चेहरा-मोहरा बदल चुका है। सो जनता को सुविधाओं या सहूलियत का हकदार नहीं समझा जाता। बेरोजगारी, अशिक्षा, बीमारी, भूख से बचने के साधन सीमित होते चले गए हैं। गरीबी, भूख, उपेक्षा, शोषण लालगढ़ की परिणतियों तक ले जाता है। पलाश विश्वास ने अपनी डायरी के माध्यम से बताया कि लालगढ़ की समस्या राष्टï्र और राष्टï्र व्यवस्था से जुड़ी हुई समस्या है। तीन दशकों से कानून व्यवस्था और प्रशासन के काम जहां आदिवासियों को लगातार गरीब बनाए रखते हुए उनकी भुखमरी, बेरोजगारी और लाचारी उनके नियमित विस्थापन की जमीन पर राजनीतिक सत्ता की इमारतें खड़ी की गईं, वे इमारतें माओवादी हिंसा में ढहती नजर आ रही हैं। लोकतंत्र और कानून व्यवस्था, न्यायपालिका और चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया को इसकी खबर लेनी चाहिए थी। यह भी कहा कि दुनिया का इतिहास गवाह है कि प्रकृति से जुड़े हुए लोग पर्यावरण की पवित्रता की तरह अपनी जीवनशैली और संस्कृति मे हमेशा शांतिपूर्ण बने रहे हैं। परंतु अब वही हथियार उठाने को मजबूर कर दिए गए। विकास का रूप यह है कि बड़े कारखानों के लिए गांव, गांव के लोगों की आजीविका, आदिवासियों के सांस्कृतिक/सामाजिक ढांचे पर गहरा प्रहार किया जाता  है। शालबनी में जिंदल के कारखाने के भूमि अधिग्रहण के विरोध में बम विस्फोट हुआ तब से आदिवासी भी माओवादी बना दिए गए।
अब राष्टï्रीय मानवाधिकार कमीशन ने उड़ीसा के मुख्य सचिव से भूख से हुई मौतों पर रिपोर्ट मांगी है। लेकिन क्या भारतीय राजनीतिक ढांचे के व्यवहार में कोई बदलाव आएगा? हमने कालाहांडी, कोरापुर से कोई सबक लिया है? बालांगीर घोरतम निर्धन लोगों का इलाका है  जो भारत के सर्वाधिक पिछड़े इलाकों में से एक है। दशाब्दियों से इस इलाके का भाग्य नहीं बदल सका। सरकार की इससे बड़ी असफलता क्या होगी कि आज तक भूख से मौत नहीं रुक पायी। गांधी जी ने हिन्द स्वराज की जो कल्पना की थी उसमें भारत के एक-एक जन तक खुशहाली का हिस्सा पहुंचाने की बात थी। परंतु राज्य के कल्याणकारी नहीं रहने से और आर्थिक शक्ति होने की होड़ में आधारभूत मानवता भी दम तोडऩे लगी है। क्या संतुलन का संबंध सूत्र ढूंढ़ा नहीं जा सकता?


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