आस्ट्रेलियाई महिला टी20 टीम को पुरुष टीम के बराबर मिलेगी इनामी राशि !    पनामा लीक : दिल्ली हाईकोर्ट ने मांगी स्टेटस रिपोर्ट !    हादसे में परिवार के 3 सदस्यों समेत 5 की मौत !    पुलिस स्टेट नहीं बन रहा हांगकांग : कैरी लैम !    प्रदर्शन के बाद खाताधारक की हार्ट अटैक से मौत !    कुछ का भत्ता बढ़ा, 25 हजार होमगार्डों की सेवायें समाप्त !    मालविंदर, शिविंदर की पुलिस हिरासत 2 दिन बढ़ी !    भारत को सुल्तान जोहोर कप में जापान ने हराया !    बुकर पुरस्कार : एटवुड एवं एवरिस्टो संयुक्त विजेता !    पीएम से मिलकर उचित मुआवजे की मांग करेंगे धरनारत किसान !    

भारतीय हॉकी की हताशा

Posted On March - 9 - 2010

आगाज़ तो अच्छा था, पर अंजाम फिर वही निराशाजनक रहा। अपने चार लीग मैच में से तीन मैच हारकर टीम सेमीफाइनल की दौड़ से बाहर हो चुकी है और अब उसे अंक तालिका में अपना प्रदर्शन सुधारने का ही संघर्ष करना है। इस बार जब विश्व कप हॉकी शुरू हुआ तो भारतीय टीम से किसी चमत्कारिक प्रदर्शन की उम्मीद का कोई और कारण नहीं था सिवाय इसके कि मेजबान होने के नाते उसे अपने ही मैदान पर अपने ही दर्शकों-प्रशंसकों के बीच खेलना था, वरना तो जो टीम पिछले विश्व कप में 11 वें स्थान यानी कि अंतिम से पहले स्थान पर रही हो, उससे आप क्या उम्मीद कर सकते हैं? फिर विश्व कप शुरू होने से पहले भी खिलाडिय़ों की पिछली बकाया राशि और प्रशिक्षण शिविर के दौरान प्रबंधों को लेकर जिस तरह विवाद शिविर के बहिष्कार और जवाब में प्रबंधन द्वारा नयी टीम चुनने की धमकी तक पहुंच गया, उससे तो खिलाडिय़ों का रहा-सहा मनोबल भी ध्वस्त हो गया होगा। इसलिए अगर कोई कहता है कि उसे इस विश्व कप में भारतीय टीम से किसी चमत्कारिक प्रदर्शन की उम्मीद थी तो इसे उसका अति आशावाद ही कहा जा सकता है। इसके बावजूद अगर भारतीय टीम का प्रदर्शन ज्यादा निराशाजनक नजर आता है तो इसलिए कि उसने अपने पहले ही लीग मैच में चिर-प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान को 4-1 के शानदार अंतर से हराकर हॉकी प्रेमियों में अनायास किसी चमत्कार की उम्मीद जगा दी थी। इसमें दो राय नहीं कि वह जीत वाकई बहुत बड़ी जीत थी। कह सक ते हैं कि हर जीत बड़ी होती है, पर जिस तरह भारतीय टीम उस मैच में खेली और जीती, वह शायद लंबे अंतराल के बाद दिखा।
हार-जीत तो कई बार किस्मत से भी हो जाती है, पर पूरे मैच में एक विजेता टीम की तरह खेलना ज्यादा बड़ी बात होती है और उस दिन भारतीय टीम ने वही कर दिखाया। अकसर कहा जाता है कि खेल कोई भी हो, भारत के विरुद्ध पाकिस्तान हमेशा ही जुनून से खेलता है और अपना सर्वश्रेष्ठ खेल दिखाता है, पर उस दिन परिदृश्य एकदम उलट था। जिस भारतीय टीम में कप्तानी को लेकर गुटबाजी की कहानियां सुनायी जा रही थीं, वह पाकिस्तान के विरुद्ध न सिर्फ पूरी तरह एकजुट नजर आयी,बल्कि पूरे मैच में अपनी प्रतिद्वंद्वी टीम पर हावी भी रही। पेनाल्टी कार्नर को गोल में तबदील न कर पाना भारत की पुरानी और पंरपरागत कमजोरी रही है, पर पाकिस्तान के विरुद्ध उस मैच में उसने पेनाल्टी कॉर्नर से भी खूब गोल दागे। आधी शताब्दी से भी लंबी प्रतिद्वंद्विता के चलते ज्यादातर भारतीय खेल-प्रेमी पाकिस्तान पर अपनी जीत को ही सबसे बड़ी उपलब्धि मान लेते हैं। इसलिए अगर पाकिस्तान के विरुद्ध जीत से ही सब कुछ पा लिया जैसा संतोष भाव दिखा तो वह स्वाभाविक ही है। दरअसल यह पाकिस्तान के विरुद्ध अपने पहले ही लीग मैच में शानदार प्रदर्शन ही था, जिसने भारतीय हॉकी प्रेमियों में किसी चमत्कारिक प्रदर्शन की उम्मीद अपनी टीम से जगा दी, पर इस उम्मीद को टूटने में भी ज्यादा वक्त नहीं लगा।
दूसरा मैच ऑस्ट्रेलिया से था। पिछले विश्व कप में 11 वें स्थान पर रही भारतीय टीम उप विजेता रही ऑस्ट्रेलिया को हरा देगी, ऐसी खुशफहमी तो शायद ही किसी को रही होगी, पर मेजबान टीम तो संघर्षपूर्ण हॉकी की कसौटी पर भी खरी नहीं उतर पायी। हार-जीत भले ही 5-2 के अंतर से रही हो, पर सच तो यह है कि ऑस्ट्रेलिया के मुकाबले भारतीय टीम कहीं टिक ही नहीं पायी। एक-एक ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी तीन-तीन भारतीय खिलाडिय़ों पर भारी पड़ रहा था और गेंंद तो जैसे ऑस्ट्रेलियाई खिलाडिय़ों के इशारों पर नाच रही थी। स्पेन के विरुद्ध अगले लीग मैच में भी वही कहानी दोहरायी गयी। हार-जीत का अंतर भी 5-2 रहा और भारतीय टीम एक बार फिर प्रतिद्वंद्वी टीम के मुकाबले ता-थैया करती नजर आयी। न रक्षक पंक्ति अपने काम को सही ढंग से अंजाम दे पायी और न ही पेनाल्टी कार्नर विशेषज्ञ। इंगलैंड के विरुद्ध जरूर भारतीय टीम अज्ञात मनोवैज्ञानिक दबाव से बाहर नजर आयी, आक्रामक हॉकी खेलने की कोशिश भी दिखी, पर लय गायब थी। इंगलैंड जहां गोल करने के अपने ज्यादातर मौकों को भुनाने में कामयाब रहा, वहीं भारत ने कुछ मौके गंवाये। नतीजतन जिस मैच पर हमारे सेमीफाइनल में पहुंचने की आखिरी उम्मीद टिकी थी, वह भी हम 3-2 से हार गये। दरअसल हार अब भारतीय हॉकी के लिए ज्यादातर चौंकाने वाला शब्द नहीं रह गया है। पिछले कई सालों से, कुछेक अपवाद को छोड़कर, भारतीय हॉकी ने लगातार पतन ही देखा है। उतार-चढ़ाव किसी भी खिलाड़ी या टीम के जीवन में आ सकते हैं, पर जब आप खराब प्रदर्शन और गलतियों से सबक नहीं सीखते तो फिर ढलान पर अंतहीन फिसलन ही आपकी नियति बन जाती है। भारतीय टीम के साथ यही होता दिख रहा है। इस विश्व कप के खराब प्रदर्शन से भी कोई शर्मिंदा नजर नहीं आता, न टीम, न कोच और न ही हॉकी के मठाधीश। दरअसल यही भारतीय हॉकी की सबसे बड़ी विडंबना है। समय आ गया है कि भारतीय हॉकी को मठाधीशों से मुक्त कराकर पूर्व खिलाडिय़ों क ो इसके पुनरुत्थान का दायित्व सौंपा जाये।


Comments Off on भारतीय हॉकी की हताशा
1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading...
Both comments and pings are currently closed.

Comments are closed.

Powered by : Mediology Software Pvt Ltd.