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बॉलीवुड की थ्रिलर फिल्में

Posted On March - 13 - 2010

रहस्य और रोमांच से भरपूर मनोरंजक फिल्में हमेशा से दर्शकों की पहली पसंद रही हैं। यदि यह कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि थ्रिलर फिल्में हमारे इंडियन सिनेमा के लिए कोई नया विषय नहीं है। 1943 में अशोक कुमार और मुमताज़ शांति अभिनीत फिल्म ‘किस्मत’ के साथ थ्रिलर फिल्मों की शुरुआत हो चुकी थी। थ्रिलर की तरफ दर्शकों के आकर्षण का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस फिल्म ने उस समय एक करोड़ रुपए का व्यवसाय किया था जो आज के 63 करोड़ के समान है। सिर्फ यही नहीं इस फिल्म को दर्शकों का इतना प्रतिसाद मिला था कि कलकत्ता के सिनेमाघर में यह लगातार 3 साल तक धड़ल्ले से चली थी। वैसे इसके बाद कई थ्रिलर फिल्में आई मगर साठ-सत्तर का दशक थ्रिलर फिल्मों का स्वर्णिम दौर था। ‘मधुमती’, ‘बीस साल बाद’, ‘वो कौन थी’, ‘तीसरी मंजि़ल’, ‘गुमनाम’, ‘कब क्यों कहां’ कुछ ऐसी चुनिंदा सुपरहिट थ्रिलर फिल्में हैं जो भारतीय सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हो चुकी हैं। आगे चलकर इन फिल्मों की जगह पारिवारिक और प्रेम-कहानी पर आधारित फिल्मों ने ले ली। मगर पिछले दस सालों से थ्रिलर फिल्मों की विरासत को रामगोपाल वर्मा ने सहेजे रखा है। उनके अलावा भी कई फिल्मकारों ने काफी अच्छी और बेहतरीन थ्रिलर फिल्में बनाई मगर रामू की फिल्मों की तरह वह फिल्में दर्शकों को चकित नहीं कर पाईं। फिलहाल कॉमेडी के दौर में एक बार फिर अपनी थ्रिलर फिल्म से लोगों का दिल जीतने आ रहे हैं शॉन अरान्हा, जो अपूर्वा की कई फिल्मों में उनके असिस्टेंट डायरेक्टर रह चुके हैं। फिल्म ‘हाइड एंड सीक’ के ज़रिए एक थ्रिलर फिल्म के साथ निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखने वाले शॉन इस बात से पूरी तरह इत्तिफाक रखते हैं कि उनकी यह फिल्म दर्शकों में हलचल मचा देगी।
अपनी फिल्म ‘हाइड एंड सीक’ के बारे में बताते हुए शॉन कहते हैं, ‘यह एक थ्रिलर सस्पेंस फिल्म है, जो छह लोगों की कहानी है। दरअसल बचपन में यह छह लोग गहरे दोस्त रहते हैं, जो एक दिन एक क्रिस्मस-ट्री के आगे-पीछे लुका-छुपी का खेल खेलते रहते हैं। खेल तो खत्म हो जाता है मगर वहां से एक नयी कहानी शुरू हो जाती है जिसका राज़ बारह साल बाद खुलता है। इस फिल्म में कई हैरान करने वाले वाकये हैं मगर एक वाकए का मैं यहां जि़क्र करना चाहूंगा कि जो छह लोग बचपन में गहरे दोस्त रहते हैं बारह साल बाद वह एक-दूसरे के लिए अजनबी हो जाते हैं। एक दिन उन सभी को एक शॉपिंग मॉल में आने का निमंत्रण मिलता है मगर जब वह वहां जाते हैं तो उस शॉपिंग मॉल में कैद हो जाते हैं और फिर शुरू होता है उनकी मौत का सिलसिला।’
पहली नज़र में यह कहानी वाकई दिलचस्प लगती है मगर इस फिल्म का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि यह फिल्म शॉपिंग मॉल को केन्द्र में रखकर बनाई गई है। हालांकि, आम तौर पर अब तक हिन्दी फिल्म इंडस्ट्री में किसी ने भी शॉपिंग मॉल को केन्द्र में रखकर कहानी की संरचना नहीं की है। अब तक शॉपिंग मॉल का इस्तेमाल फिल्मों में लोगों के मनोरंजन के लिए होता था मगर इस फिल्म में शॉपिंग मॉल एक रहस्य के रूप में उजागर हुआ है। फिल्म के मुख्य कलाकार हैं अर्जन बाज़वा, पूरब कोहली, समीर कोचर, अयाज़ खान, मृणालिनी शर्मा और अमृता पत्की। हालांकि यह कोई बड़े नाम नहीं हैं मगर शॉन के अनुसार उनकी फिल्म की डिमांड यही कलाकार थे। उनका कहना है, ‘मैंने ऐसे छह कलाकारों को लिया जो नये होने के साथ-साथ अनोखे भी हैं। मेरी फिल्म की कहानी की मांग थी कि जिन कलाकारों का मैं चुनाव करूं उन्होंने 10-15 फिल्में न की हों। वह इस इंडस्ट्री के लिए नये हों और मुझे अपना पूरा समय दे सकें। वरना आप सोच सकती हैं बड़े कलाकारों को इतने दिन तक अहमदाबाद के किसी शॉपिंग मॉल में कैद करके रखना मेरे लिए काफी मुश्किल होता।’
आम तौर पर थ्रिलर फिल्मों की तरफ दर्शकों का ध्यान हॉलीवुड में बनी हेरल्ड लॉयड की फिल्म ‘से$फ्टी लास्ट’ के ज़रिए गया जो 1923 में बनी थी। आम तौर पर यह फिल्म कॉमेडी को ध्यान में रखकर बनाई गई थी मगर थ्रिलर के गुणों से लबरेज़ इस फिल्म को विशेष रूप से थ्रिलर के लिए ही पसंद किया गया। वैसे हम जब हॉलीवुड का जि़क्र करें तो अल्फ्रेड हिचकाक की थ्रिलर फिल्मों को कैसे भुलाया जा सकता है, जो अधिकतर थ्रिलर निर्देशकों के गुरु माने जाते हैं। थ्रिलर फिल्मों की शृंखला को बदस्तूर कायम रखने के लिए उनका नाम गिनीज़ बुक ऑफ वल्र्ड रिकॉर्ड में भी दजऱ् है। हिचकाक की फिल्मों से शॉन भी खासे प्रभावित हैं। उनका कहना है, ‘मुझे हॉलीवुड के फिल्मकार अल्फ्रेड हिचकॉक की सभी थ्रिलर फिल्में बहुत पसंद हैं। साथ ही कुछ जापानी थ्रिलर सस्पेंस फिल्में भी बहुत पसंद हंै। ‘मूल रूप से थ्रिलर फिल्मों से सभी प्रभावित रहते हैं मगर असली थ्रिलर फिल्में होती क्या हैं इसे परिभाषित कर पाना थोड़ा मुश्किल काम है। 65 से भी अधिक थ्रिलर उपन्यास लिख चुके अमेरिकन लेखक जेम्स बी पैटर्सन ने थ्रिलर को परिभाषित करते हुए लिखा हैं, ‘रोमांच कई प्रकार के हो सकते हैं मगर ज़रूरी यह है कि उस रोमांच के ज़रिए हमारी भावनाओं का विस्तार हो और हम उसे थोड़ी आशंका, थोड़ी उत्तेजना और थोड़ी सांसों की बढ़ती रफ्तार से हासिल कर सके। सच कहूं तो रोमांच वही है जिसके ज़रिए दर्शक रोमांचित अनुभव कर सके। यदि हम उसे देने में नाकामयाब होते हैं तो हमें मान लेना चाहिए कि हमने अपना काम सही तरीके से नहीं किया है।’ हालांकि, वह इस बात से भी इत्तिफाक रखते हैं कि यदि हम अपनी जीत ज़ोर-शोर से मनाना चाहते हैं तो हमें अपनी हार को भी बिना किसी परेशानी के मान लेना चाहिए।
जेम्स की बातों से शॉन भी सहमत हैं उनके अनुसार थ्रिलर फिल्मों का बाज़ार हमेशा गर्म रहता है मगर ज़रूरी यह है कि अच्छी थ्रिलर फिल्में बनें। सिर्फ छह करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म को बनाने में महज़ 27 दिन लगे। शॉन के अनुसार लो बजट में थ्रिलर फिल्में बनाना ही फायदे का सौदा है।
यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि हमारे धर्मग्रंथ महाभारत में भी कहानी कहने के लिए इसी विधा अर्थात थ्रिलर का इस्तेमाल किया गया है। उदाहरण के तौर पर पांडवों का लाक्षा गृह में जलकर मरने का प्रकरण हो या उनका अज्ञात वास हो, कृष्ण द्वारा की गई लीलाएं भी रहस्य और रोमांच का अच्छा उदाहरण हैं, जिनमें जयद्रथ वध अविस्मरणीय है।
थ्रिलर का अर्थ ही है दर्शकों में अव्यक्त के प्रति एक मोह को बनाए रखना। जहां तक फिल्मों की बात है तो दर्शकों को ‘आगे क्या होगा’ के इंतज़ार में अपनी सीट से बांधे रखना हर थ्रिलर फिल्म की यूएसपी है। शॉन भी अपनी फिल्म ‘हाइड एंड सीक’ की यूएसपी फिल्म का रहस्य मानते हैं।
यह बात सच है कि थ्रिलर फिल्मों की यूएसपी उनका रहस्य होती है मगर बात तो तब है जब रहस्य दर्शकों को लुभाकर सिनेमाघर ला सके। हालांकि, इससे पहले कई बडे बजट की थ्रिलर फिल्में आईं मगर दर्शकों के दिलों में अपनी कोई जगह नहीं बना सकी। ‘कैश’, ‘नकाब’, ‘अगर’, ‘स्पीड’, ‘द ट्रेन’ और ‘थ्री’ कुछ ऐसी ही फिल्में हैं जिन्होंने आने से पहले शोर तो बहुत मचाया मगर अपना प्रभाव नहीं छोड़ सकीं। अब देखना यह है कि शॉन अरान्हा की ‘हाइड एंड सीक’ दर्शकों से महज़ लुका-छुपी ही खेलती है या उनके दिलो-दिमाग पर अपना खास असर भी छोड़ती है।

आर गुप्ता


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