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बाज़ार से बनाइए रोज़गार

Posted On March - 10 - 2010

रोज़गार गारंटी

डा. भरत झुनझुनवाला
यूपीए सरकार का आम आदमी के प्रति नरम रुख है। रोजगार गारंटी कार्यक्रम से गरीबतम लोगों को निश्चित रूप से राहत मिली है। दो घंटा आधा-अधूरा काम करके 100 रुपये मिल जाते हैं। पहले गांव में दिहाड़ी 100-120 रुपये थी। रोजगार गारंटी के लागू होने के बाद श्रमिक 8 घंटे मजदूरी करने के लिए 140-150 रुपये की मांग कर रहे हैं। आम आदमी की आय में यह वृद्धि सुखद प्राप्ति है। कुछ विश्लेषकों का मत है कि इस कार्यक्रम के कारण लोग निकम्मे हो रहे हैं। उनकी काम करने की रुचि समाप्त हो गयी है। मेरा मानना है कि यह दुष्प्रभाव अल्पकालिक होगा। हर व्यक्ति की सुख हासिल करने की कामना होती है। कुछ दिन आराम करने के बाद गरीब के मन में टेलीविजन आदि देखने की इच्छा अवश्य उत्पन्न होगी और वह पुन: रोजगार की तलाश में निकलेगा। अर्थव्यवस्था का मूल उद्देश्य आम आदमी को राहत पहुंचाना है। अत: आम आदमी को मिल रही राहत को अनदेखा नहीं करना चाहिए।
रोजगार गारंटी कार्यक्रम की मुख्य समस्या दूसरे स्थान पर है। इस कार्यक्रम को पोषित करने के लिए बड़े शहरी उद्योगों पर टैक्स लगाया जाता है। अर्थ हुआ कि रोजगार गारंटी कार्यक्रम तब ही चलाया जा सकता है जब बड़े उद्योगों को लाभ उन्नत हों। इन लाभों को कमाने के लिए बड़े उद्योगों द्वारा आटोमेटिक मशीनों का उपयोग किया जायेगा और रोजगार का भक्षण होगा। बड़े उद्योगों द्वारा पैदा की गयी बेरोजगारी की समस्या को इन्हीं उद्योगों पर टैक्स लगा कर हल करने का प्रयास किया जा रहा है। यह प्रक्रिया अन्तत: सफल नहीं होगी। आम आदमी को जितनी राहत रोजगार से मिलेगी उससे ज्यादा कष्ट आटोमेटिक मशीनों के उपयोग से होगा।  यूपीए सरकार के सामने मुख्य चुनौती है आटोमेटिक मशीनों से उत्पन्न होने वाली बेरोजगारी पर ही फुलस्टाप लगाना। बाजार के माध्यम से ही रोजगार सृजन किया जाये जिससे रोजगाार गारंटी जैसे कार्यक्रम की जरूरत ही न पड़े। तब न तो श्रमिकों में निकम्मापन आयेगा और न ही सरकारी तंत्र को भ्रष्टाचार में लिप्त होने का अवसर मिलेगा।
इस दिशा में अनेक कदम उठाये जा सकते हैं। जिस माल के उत्पादन में श्रम का योगदान ज्यादा है उस पर एक्साइज ड्यूटी, आयकर और सेल्स टैक्स की दरें कम कर दी जायें। सघन उद्यमों पर इन्हीं करों की दरों को बढ़ा दिया जाये। ऐसा करने से टैक्स की औसत दर पूर्ववत् बनी रहेगी परन्तु उद्यमियों के लिए श्रमिकों से काम कराना लाभप्रद हो जायेगा। जो उद्योग ज्यादा संख्या में रोजगार बनाएंगे उन्हें टैक्स कम देना होगा। श्रम के अधिक उपयोग में हुए व्यय की भरपायी टैक्स में छूट से हो जायेगी। जिस प्रकार कम्पनियों को एनर्जी आडिट कराना पड़ता है उसी प्रकार रोजगार की आडिट कराई जा सकती है। सरकारी ठेकों एवं खरीद में श्रम सघन उत्पादन करने की शर्त लगाई जा सकती है। जो उद्यमी अधिक रोजगार देते हैं उन्हें पद्मश्री सरीखे सम्मान से नवाजा जाये।
वर्तमान में विश्व व्यापार का संचालन डब्ल्यूटीओ के द्वारा किया जा रहा है। डब्ल्यूटीओ में अमीर देशों के सेवा बाजार को जबरन खोलने की व्यवस्था नहीं है जबकि विकासशील देशों के कृषि एवं मैन्यूफैक्चर्ड माल के बाजार को जबरन खोलने की व्यवस्था है। अमीर देशों का प्रयास है कि डब्ल्यूटीओ की परिधि को कृषि और औद्योगिक माल तक सीमित रखा जाये। सेवाओं को खोलने के विषय को सदस्य देशों की स्वेच्छा पर छोड़ दिया गया है। भारत को तमाम विकासशील देशों को इस मुद्दे पर लामबंद करना चाहिए और अमीर देशों में हमारे श्रमिकों के प्रवेश की मांग पर अडऩा चाहिए।
सरकार श्रम कानूनों को सरल और लचीला बनाना चाहती है। परन्तु कुछ मध्यधारा विद्वानों का दबाव है कि घटते रोजगारों की स्थिति में श्रम कानूनों को सरल बनाना और घातक हो जायेगा। इस विचार में समस्या है। रोजगार भक्षण में मूल समस्या का समाधान कड़े श्रम कानून से हासिल नहीं होता है। बल्कि सख्त श्रम कानून बनाने से बचने के लिए उद्यमियों द्वारा आटोमेटिक मशीनों का उपयोग ज्यादा किया जा रहा है। श्रम कानून की दवा ही बेरोजगारी को बढ़ावा दे रही है। भूख से पीडि़त व्यक्ति को एयरकंडीशंड कमरे में रखकर नहीं जिलाया जा सकता है। उसे भोजन खिलाने से ही जीवन दान मिलेगा। प्रश्न उठता है कि वैश्वीकरण के युग में बाजार में ऐसा दखल टिक सकता है क्या? रोजगार को प्रोत्साहन देने की इस पालिसी के कारण भारत में श्रम-सघन उत्पादन की लागत बढ़ेगी जबकि हमारे प्रतिद्वंद्वी देशों में पूंजी-सघन उत्पादन से लागत न्यून रहेगी। यह समस्या वास्तविक है परन्तु इसका दूसरा निदान उपलब्ध है। दूसरे देशों के पूंजी-सघन उत्पादन पर आयात कर बढ़ाना होगा और अपने श्रम-सघन उत्पादन पर निर्यात् सबसिडी देनी होगी। हमें समझ लेना चाहिए कि आर्थिक वैश्वीकरण का अर्थ बेरोजगारी का भी वैश्वीकरण होता है। विश्व के सभी देशों को उस देश के बेरोजगारी के मानकों को स्वीकार करना होगा जो कि अधिकाधिक बेरोजगारी उत्पन्न करता है। अमेरिका के न्यून रोजगार के दबाव से सम्पूर्ण विश्व के श्रमिकों में हाहाकार मचा हुआ हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं। इस समस्या के निदान के लिए वैश्वीकरण को संतुलित मात्रा में अपनाना होगा।
दुर्भाग्य है कि वित्तमंत्री द्वारा हाल में पेश किये गये बजट में रोजगार के सृजन पर तनिक भी ध्यान नहीं दिया गया है। वास्तव में रोजगार गारंटी कार्यक्रम में भी केवल दिखावटी वृद्धि की गयी है। पिछले वर्ष 2009-10 के बजट में इस कार्यक्रम को 39,100 करोड़ रुपये आवंटित किये गये थे। आगामी वर्ष 2010-11 में इसे बढ़ाकर 40,100 करोड़ कर दिया गया है। 10 प्रतिशत महंगाई को देखते हुए इस कार्यक्रम के अंतर्गत दी जाने वाली दिहाड़ी को 100 रुपये से बढ़ाकर कम से कम 110 रुपये करना था। परन्तु वित्तमंत्री ने आवंटित राशि पूर्ववत् रखकर आम आदमी के साथ दोहरा छलावा किया है। पहले रोजगार को बाजार से उत्पन्न करने के स्थान पर रोजगार गारंटी के सरकारी कार्यक्रम के माध्यम से पैदा किया गया है। आम आदमी को बाजार की स्वतंत्रता से वंचित कर सरकारी अधिकारियों के हवाले कर दिया गया है। फिर उनकी दिहाड़ी पर पड़ रही महंगाई की मार से रक्षा नहीं की गयी है। यदि सरकारी कर्मचारियों को डीए मिलता है तो रोजगार गारंटी में भी मिलना चाहिए। अत: सरकार को इस कार्यक्रम में उलझने के स्थान पर बाजार को रोजगार की ओर मोडऩा चाहिए।


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