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पहला नशा, पहला खुमार

Posted On March - 13 - 2010

कोंकणा सेन शर्मा की पहचान ऐसी अभिनेत्री के तौर पर है, जो आम तौर पर संजीदा किस्म के रोल ही करती हैं, लेकिन हाल ही रिलीज होने वाली फिल्म ‘अतिथि तुम कब जाओगे?’ में दर्शकों ने उन्हें एक नए रूप में देखा। निर्देशक अश्विनी धीर की इस फिल्म में कोंकणा ने अपने कॉमेडी के अंदाज से दर्शकों को लुभाने की कोशिश की है। इस इंटरव्यू में कोंकणा अपने इस पहले तजुर्बे की चर्चा कर रही हैं :-
आपकी पहली पूरी कॉमेडी फिल्म ‘अतिथि तुम कब जाओगे?’ में काम करने का अनुभव कैसा रहा?
मुझे हल्की-फुल्की फिल्मों के प्रस्ताव कम ही मिलते हैं, इसलिए ‘अतिथि….’ में काम करना मेरे लिए बहुत ही खास अनुभव था। पहली बार मैंने ऐसा लाइट मूड का रोल किया और इसकी खुमारी अब तक बाकी है। मुझे इस बात की बहुत खुशी है कि अश्विनी धीर ने मेरे बारे में सोचा, क्योंकि आम तौर पर मेरा नाम इस तरह की फिल्मों के साथ जोड़कर नहीं देखा जाता है। इससे पहले जो हल्की-फुल्की फिल्में मैंने की हैं, जैसे ‘मेट्रो’ और ‘मिक्स्ड डबल्स’, एक तो वे संख्या में बहुत कम हैं और दूसरे उनके बीच बड़ा अंतराल रहा है।
ऐसा कहा जाता है कि परदे पर कॉमेडी करना गंभीर भूमिकाएं निभाने से कहीं ज़्यादा मुश्किल होता है। क्या आप भी इस बात से सहमत हैं?
मेरे खयाल से तो यह बात उस किरदार पर निर्भर करती है, जिसे आप परदे पर निभा रहे हैं। अगर कोई कैरेक्टर ऐसा है, जिसे ठीक से गढ़ा नहीं गया है या उसे लिखने से पहले अच्छी तरह सोच-विचार नहीं किया गया है, तो उसे अभिनीत करना मुश्किल हो जाता है। लेकिन अगर स्क्रिप्ट अच्छी तरह से लिखी गई है और जो भी घटित हो रहा है, उसके पीछे सही सोच है, तो फिर अभिनेता का काम बहुत आसान हो जाता है।
क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि बॉलीवुड में अच्छी कॉमेडी करने वाली अभिनेत्रियों की तुलना में अभिनेताओं की संख्या ज्यादा है?
मुझे ऐसा नहीं लगता। आप देखिए कि श्रीदेवी, माधुरी दीक्षित, जूही चावला, ये सब अपनी कॉमेडी के लिए भी जानी जाती हैं।
अजय देवगन के साथ आपने पिछली बार ‘ओमकारा’ में काम किया था, यह एक बहुत ही खास अनुभव रहा होगा?
हमने ‘ओमकारा’ में काम तो किया था, लेकिन एक साथ हमारे सीन बहुत ही कम थे। अजय का बर्ताव बहुत ही गंभीर किस्म का है और लोग अक्सर यह सोचते हैं कि मैं भी उसके जैसी ही हूं। लेकिन यह फिल्म करते हुए मैंने महसूस किया कि हम दोनों में से कोई भी असल में उस तरह का नहीं है।
‘अतिथि…’ के रोल को आपने विश्वसनीय बनाने का क्या प्रयास किया?
मोटे तौर पर तो इस फिल्म में जो कॉमेडी है, वह सिचुएशनल है और ऐसी सिचुएशन अधिकतर तो उस अतिथि के कारण पैदा होती हैं, जिसकी भूमिका परेशजी ने अदा की है।
अतिथि के कारण कभी आपको भी अगर मुसीबतों का सामना करना पड़ा हो, तो जरा उनके बारे में कुछ बताएं?
अतिथि के कारण फिल्म में जैसा होता है, मेरे साथ अपनी जि़ंदगी में तो कभी वैसा कुछ हुआ नहीं। असल में तो अपनी पूरी जि़ंदगी में मैं खुद ही एक अतिथि रही हूं। अपने कॉलेज के दिनों में मैं अपने बहुत सारे दोस्तों के घर अतिथि रही हूं। मुंबई में भी मैं अतिथि रही हूं। अभी हाल ही मैंने अपना घर खरीदा है और यहां मैं अकेली रहती हूं , इसलिए जब भी कोई मेहमान मेरे यहां आता है, मुझे तो बड़ी खुशी होती है। मैं तो यह दुआ भी करती हूं कि कोई न कोई मेरे घर आता ही रहे।
क्या आपको लगता है कि लोगों के लिए अनचाहे मेहमान बड़ी परेशानी का कारण होते हैं?
मैं सोचती हूं कि लोगों को यह फिल्म इसलिए अपनी-सी लगेगी क्योंकि यह आज के समय में मुंबई जैसे शहरों में युवा जोड़ों की जि़ंदगी से ताल्लुक रखती है। मुंबई में ऐसे बहुत सारे लोग हैं जो बाहर से आए हैं और पूरे देश से लोग यहां आकर अपने लिए जगह बनाने के लिए संघर्ष करते हैं। जब उनके यहां उनके अपने मूल स्थान से कोई मेहमान आकर ठहरता है, तो प्राइवेसी की समस्या हो जाती है।
‘वेकअप सिड’, ‘लक बाई चांस’ और ‘अतिथि…’—यह सूची क्या यह जाहिर नहीं करती कि कला फिल्मों की अभिनेत्री के रूप में अपनी शुरुआत करके आप अब पूरी तरह कॉमर्शियल सिनेमा की तरफ मुड़ गई हैं?
मैं अपने आपको इस तरह के खांचों में बांटकर नहीं देखती। अगर दूसरे लोग इस तरह से देखना चाहें, तो वे देखें। कलाकार के रूप में तो हम सिर्फ उन भूमिकाओं का चुनाव करते हैं, जिन्हें हम उस वक्त अदा करना पसंद करते हैं। मैं नहीं सोचती कि हमारा अपनी इमेज पर भी बहुत ज़्यादा नियंत्रण है।
इंडस्ट्री में आप अपनी पहचान किस रूप में बनाना चाहती हैं?
मैं सिनेमा को व्यापार का हिस्सा नहीं मानती हूं। मेरे लिए सिनेमा अभिनय का माध्यम है। सिनेमा का अर्थ सिर्फ अभिनय है। मैं यह भी नहीं समझती कि सिनेमा से पैसे कैसे बनाए जाते हैं। मुझे यह सब पसंद ही नहीं है। इसलिए जो भी अच्छा रोल मिले, मैं उसे खुशी-खुशी निभाने में यकीन करती हूं। सिनेमा के जरिए मैं अभिनय करना चाहती हूं, लोगों से मिलना चाहती हूं लेकिन फायदा नहीं उठाना चाहती।

प्रतीक एम


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