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नौकरियों की बंदरबांट

Posted On March - 10 - 2010

पंजाब सार्वजनिक चिकित्सा सेवा में चिकित्सकों की भर्ती में पैसे और प्रभाव के बलबूते पर शर्मनाक ढंग से जो नियुक्तियां हुई हैं, वे हमारी व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टïाचार की एक बानगी दिखाती हैं। पंजाब लोक सेवा आयोग के जरिये हुई नियुक्तियों में समाज को न्याय दिलाने वाले वर्ग के नाते-रिश्तेदारों को जिस तरह चयनित किया गया उससे भ्रष्टï व्यवस्था में न्याय भी मृग-मरीचिका सरीखा नज़र आता है। सवाल यह उठता है कि इतने बड़े पैमाने पर खुलेआम धांधली हुई और सरकार व उसकी एजेंसियों को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? खबरों में मामला उछल जाने के बाद भले ही सरकार जांच व कार्रवाई की बात कह रही हो लेकिन पिछला इतिहास यही बताता है कि ऐसे मामलों में लीपापोती के अलावा कुछ नहीं होता। सवाल यह भी उठता है कि कम अंक पाने वाले प्रत्याशी जब प्रभाव व पैसे के बल पर नियुक्ति पा जाते हैं तो वे चिकित्सा जैसे व्यवसाय में मरीजों का कारगर ढंग से इलाज कर पाएंगे? जब प्रतिभाशाली प्रत्याशी नियुक्ति पाने से वंचित रह जाते हैं तो सिर्फ कुंठा, हताशा और बेकारी के अवसाद में डूबने के अलावा उनके सामने कोई चारा नहीं रह जाता। यह अन्यायकारी भाई-भतीजावाद तथा चांदी के जूते के जोर पर नौकरियां कब्जाने का सिलसिला यूं ही बदस्तूर जारी रहा तो इसके घातक परिणाम सामने आएंगे। यही वजह है कि पंजाब की प्रतिभाएं लगातार विदेशों में पलायन करने को मजबूर हैं। वे अपनी इच्छा से विदेश नहीं जाते बल्कि यहां के हालात उन्हें पलायन को बाध्य करते हैं।
पंजाब चिकित्सा सेवा में डाक्टरों के चयन में जिस कदर धांधले-बाजी हुई है वह चयन करने वाली संस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करती है। अधिकांश चयनित प्रत्याशी प्राइवेट मेडिकल कालेजों से जैसे-तैसे पास होकर एमबीबीएस की डिग्री हासिल कर पाए हैं। सबसे दुखद पहलू यह है कि येन-केन-प्रकारेण डिग्री हासिल करने वाले बड़े लोगों की संतानें मेरिट लिस्ट में टॉप पर नज़र आ रही हैं। पंजाब सरकार में मंत्री, न्यायाधीश, आईएएस अधिकारी, आईपीएस अधिकारियों के परिजन की बहुलता वाली सूची यही बताती है कि चयन प्रक्रिया में किस स्तर तक धांधली हुई है। राजनीति, पुलिस प्रशासन के लोग नौकरियों की बंदरबांट में किस तरह एकजुट हैं, ये नियुक्तियां उसका सच बयां करती हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि आज साधनविहीन प्रतिभावान प्रतियोगियों को किन हालातों से गुजरना पड़ रहा है। वास्तव में होता  यह है कि लोक सेवा आयोगों में शीर्ष स्तर की नियुक्तियां भारी राजनीतिक दबाव के चलते होती हैं। फिर वे भी इसी भ्रष्टï व्यवस्था के पोषण में लग जाते हैं। वे अपने राजनीतिक आकाओं के इशारों पर सारे कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर नियुक्तियां करने लगते हैं। डाक्टरों की नियुक्तियों में जो धांधली उजागर हुई है वह एक व्यक्ति या संस्था के बलबूते पर नहीं बल्कि सत्ता पर काबिज प्रभावशाली और पैसे वालों के अपवित्र गठजोड़ की परिणति है। इतना स्पष्टï है कि जब तक देश में नौकरी देने वाली संस्थाओं में पारदर्शिता व निष्पक्षता का अनुपालन नहीं होता तब तक नौकरियों की बंदरबांट इसी तरह जारी रहेगी।


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