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नव संवत्

Posted On March - 13 - 2010

नव संवत् सड़सठ है आया,
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन मन भाया।
चारों तरफ फसलें पकी,
सरसों, गेहूं की बाली झुकी,
रुकी सर्द हवा ने बसंत मनाया,
नव संवत् सड़सठ है आया।
बजट सत्र, परीक्षा की घड़ी,
वित्त, चित्त की चिंता बड़ी,
पड़ी शांत फाग, नवरात्र नियराया,
नव संवत् सड़सठ है आया।
मौसम सुहाना सुहानी बयार,
बढऩे लगता सृष्टिï में प्यार।
चार दिन की चांदनी ज्यों सुख छाया,
नव संवत् सड़सठ है आया।

मलमास वैशाख इसमें है,
ऐसा तिथियों का विधान किसमें है।
जिसमें है अनूठी ज्योतिष की माया,
नव संवत् सड़सठ है आया।

भारतीय संस्कृति का द्योतक है,
शिशु के हाथ में ज्यों मोदक है।
हक है ‘विजय’ का सबने पाया,
नव संवत् सड़सठ है आया।
-विजयपाल सेहलंगिया


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