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तीन बातें

Posted On March - 21 - 2010

भीलपुर नामक एक छोटा-सा गांव था। यह गांव चारों तरफ पहाडिय़ों से घिरा हुआ था अत: इतना विकसित नहीं था। लोगों को अपनी दैनिक आवश्यकताओं की वस्तुएं लाने के  लिए भी आस-पड़ोस के कस्बों में जाना पड़ता था। वहां लगने वाली पैंठ (स्थानीय बाजार) से वे रोजमर्रा की वस्तुएं ले आते।
वहां एक जुलाहा अपनी पत्नी के साथ रहता था। उनकी कोई संतान नहीं थी। वे बहुत गरीब थे। अत्यधिक मेहनत करने के बाद ही वे दो वक्त की रोटी जुटा पाते। एक दिन जुलाहे की पत्नी ने कहा कि घर का सारा सामान खत्म हो गया है। मेरे पास  तीन रुपये हैं। तुम कस्बे में लगने वाली पैंठ से आटा-चावल, तेल, नमक, मसाले इत्यादि सामान ले आओ। ठीक है जुलाहा कहकर चलने को तैयार हो गया। उसकी पत्नी ने उसे पैसे देकर रास्ते के लिए खाना बांधकर दे दिया। जुलाहा कस्बे की ओर चल पड़ा।
रास्ते में उसे एक घुड़सवार मिला जो कस्बे की ओर जा रहा था। वह  कहने लगा —भैया मुझे भी साथ ले चलो। घुड़सवार ने उसे भी बैठा लिया। दोनों चुपचाप जा रहे थे। अचानक जुलाहा बोला- घुड़सवार भाई, कोई बात ही सुना दो। घुड़सवार कहने लगा-बात तो है पर उसके पैसे लगते हैं। जुलाहा बड़ा  हैरान हुआ। बात के पैसे और सोचने लगा कि पैसों वाली बात कैसी होती होगी।  घुड़सवार ने पूछा— क्यों क्या हुआ?
वह कहने लगा— मेरे पास सिर्फ तीन रुपये हैं। घुड़सवार बोला —तुम्हारी मर्जी। एक रुपया एक बात, यही मूल्य है। जुलाहा तैयार हो गया। घुड़सवार ने कहा, मरे हुए व्यक्ति को ले जाकर फेंक देना  चाहिए। अब दो एक रुपया। जुलाहे ने चुपचाप दे दिया, पर उसे बहुत आनंद आया। वह सोचने लगा कि देखूं दूसरी बात किस प्रकार की होगी। जुलाहा कहने लगा एक बात तो बता दी, अब दूसरी बात भी कह दो। घुड़सवार ने कहा कि पत्नी के सामने कभी सच नहीं बोलना चाहिए। जुलाहा अब सोच में पड़ गया। अब उसके पास शेष एक रुपया रह गया था। वह सोचने लगा कि अब इससे मैं क्या करूंगा। इसका कौन-सा सामान आ जाएगा। उसने कहा, लो तीसरा रुपया और तीसरी बात भी सुना दो। घुड़सवार ने कहा, राजा के आगे कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। जुलाहे के सारे पैसे खत्म हो गये थे। उसने कहा- मुझे यहीं उतार दो। मैं चला जाऊंगा। घुड़सवार उसे अलविदा  कहकर आगे बढ़ गया।
जुलाहे ने खाने की पोटली खोली और वहीं बैठकर खाने लगा। तभी वहां से कुछ दूर सिपाही गुजर रहे थे। उन्होंने जुलाहे को देखकर आवाज लगाई-अरे भैया, यहां एक लाश पड़ी है इसे फेंक दो, तुम्हें पांच रुपये देंगे। यह बात सुनकर जुलाहे को घुड़सवार की पहली बात याद आ गई। वह पांच रुपये की बात सुनकर हां जी कहकर वहां चला गया। जब वह मुरदे को लेकर जा रहा था तो उसे लास के कपड़ों से मोहरों की एक थैली मिली। उसने लाश को फेंका और खुशी-खुशी पैंठ चला गया। वहां जाकर खूब खाया-पीया, घर का सामान कपड़े और एक घोड़ा खरीदकर घर की ओर चल पड़ा। उसने महंगे कपड़े पहने हुए थे।  घोड़े पर पति को देखकर उसे कुछ समझ नहीं आया। वह पूछने लगी कि ये पैसे, सामान कहां से आया। उस जुलाहे को घुड़सवार की दूसरी बात याद आ गई। वह कहने लगा कि खाने से मेरा पेट नहीं भरा। वहां एक आक का पौधा था उसका दूध पीया, वहां एक थैली गिरी हुई थी। जुलाहे की पत्नी ने कहा —जो भी है, चलो हम अमीर तो हुए। अब सुख से दिन कटेंगे।
उसकी संपन्नता देखकर पड़ोसन भी आई और धन-दौलत का कारण पूछा। जुलाहे की पत्नी ने सारी बात कह सुनाई। उसने भी अपने पति को जंगल में रुकने फिर पैंठ में जाने के लिए कहा। वह गया और उसने भी आक का दूध पीया। उसे खून की उल्टियां लग गयीं। वह मर गया। पड़ोसन रोने लगी और सारा दोष जुलाहे की पत्नी को देने लगी। उसने राजा के पास जाकर शिकायत कर दी।  राजा ने जुलाहे को बुलाया और अपनी सफाई देने को कहा। जुलाहे को घुड़सवार की तीसर बात याद आ गई। उसने राजा को शुरुआत से लेकर अंत तक की पूरी कहानी सुना दी। राजा हंसने लगा और उसने जुलाहे को छोड़ दिया। वह पड़ोसिन को कहने लगा कि तुम्हें नहीं पता था कि आक का दूध पीने से उल्टियां लग जाती हैं। गलती तुम्हारी है। जुलाहे का कोई दोष नहीं। अत: जुलाहे के द्वारा खरीदी गई तीन बातें उसके लिए बहुत फलदायक सिद्ध हुईं।


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