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गुस्से से भी भरी है नई पीढ़ी

Posted On March - 28 - 2010

मल्टी नेशनल कंपनी में अच्छी पोस्ट पर कार्यरत नमन के पास जीवन की लगभग हर खुशी है। रहने के लिए एक अच्छा घर, पढ़ी-लिखी, समझदार बीवी व पांच साल का प्यारा-सा बेटा। आर्थिक रूप से काफी मजबूत नमन ऑफिस में भी अच्छा परफोर्मेंस देता है। लेकिन उसकी एक आदत से घर और ऑफिस में उसके सहयोगी सभी परेशान रहते हैं। नमन स्वंय ही अपनी इस आदत से काफी परेशान है। यह आदत है छोटी-छोटी बातों पर अकसर नमन को गुस्सा आ जाता है।
उसे खुद भी नहीं मालूम कि कब और किस बात पर उसे गुस्सा आ जाए और वह दूसरों पर चीखने-चिल्लाने लगे। सारी सुख-सुविधाएं होने के बावजूद नमन के गुस्से की इस आदत के कारण वह अकसर परेशान रहता है। यह गुस्सा ही है जिसने नमन की छवि घर और ऑफिस दोनों ही जगहों पर बिगाड़ कर रख दी है। कभी-कभी तो नमन अपनी इस आदत से इतना परेशान हो जाता है कि उसे सब कुछ बर्बाद कर देने की इच्छा होने लगती है। नमन की ही तरह देश के युवाओं का एक बड़ा वर्ग गुस्से की इस बीमारी से ग्रस्त होता जा रहा है। इस समस्या ने न सिर्फ हमारी युवा पीढ़ी की कार्यक्षमता को प्रभावित किया है बल्कि देशभर में आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देने वाले ज्यादातर मामलों के पीछे यह गुस्सा ही होता है। गुस्से ने आज की युवा पीढ़ी को आउट ऑफ कंट्रोल कर दिया है। हमारी नई पीढ़ी गुस्से की इस कदर आदी हो चुकी है कि अब गुस्सा उन पर पूरी तरह हावी हो चुका है जिसे नियंत्रित करना उनके वश की बात नहीं रह गयी है। यूं तो गुस्सा आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन जरूरत से ज्यादा गुस्सा आपके बीमार होने का लक्षण है।
बेवजह छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने का अर्थ है आप इन्सोमेनिया या डिप्रेशन के शिकार हैं। यह दोनों प्रकार की बीमारियां सीधे हमारे दिमाग पर असर डालती हैं। आज की युवा पीढ़ी के गुस्से का स्तर पागलपन की हद तक पहुंच चुका है। गुस्से की बीमारी से ग्रस्त होने वालों को यह पता ही नहीं चलता कि वे किस हद तक इसके शिकार होते जा रहे हैं। अगर आप सड़क पर मौजूद टै्रफिक जाम को देखकर और गलियों में होने वाले बेकार के शोर को सुनकर अचानक बुरी तरह चीखने-चिल्लाने लगते हैं और तब तक चिल्लाते रहते हैं जब तक आपके गले में दर्द न होने लगे, तो समझिये आप गुस्से की घातक बीमारी से ग्रस्त हैं। गुस्से की समस्या से परेशान रहने वाले लोगों को कभी-कभी तो आपस में जोर-जोर से हंस-बोल रहे दो लोगों पर या उछल-कूद करते हुए बच्चों पर ही काफी तेज गुस्सा आ जाता है और वे बिना किसी कारण के उन पर चीखने-चिल्लाने लगते हैं।
अब इसे पागलपन नहीं तो और क्या कहा जाएगा? गुस्से की बीमारी से ग्रस्त लोग इस पर नियंत्रण नहीं रख पाते और समय-समय पर गुस्सा उन्हें आपे से बाहर कर देता है जो न चाहते हुए भी उन्हें चुप रहने नहीं देता है। वे अपने गुस्से के सामने आने वाले किसी भी व्यक्ति को इसका शिकार बना देते हैं। कभी-कभी तो गुस्सा हमें इस कदर परेशान करता है कि हम पहली बार मिले किसी व्यक्ति को भी बिना कुछ सोचे-समझे कुछ भी बोल देते हैं। भले ही इससे हमारा कितना भी नुकसान क्यों न हो जाए।
आज की न्यू जनरेशन पर गुस्सा इस कदर हावी हो चुका है कि वह अपने फायदे और नुकसान को दरकिनार कर गुस्से को जाहिर करने में जरा सी भी देरी नहीं करना चाहती। इस देरी न करने के कारण ही समाज में आपराधिक प्रवृत्तियों का जाल दिनों-दिन फैलता ही जा रहा है। गुस्सा हमारे दिमाग पर इस कदर प्रभाव डालता है कि हमारे सोचने-समझने की सारी शक्ति कुछ देर के लिए खत्म-सी हो जाती है। फिर हम वही करते हैं जो हमारा गुस्सा हमसे करवाना चाहता है। लगातार गुस्से
में बने रहने वाले
लोगों के पारिवारिक व सामाजिक रिश्ते भी बिगड़ जाते हैं। ऑफिस तो दूर
घर पर उनके अपने भी उनसे कतराने लगते हैं।
गुस्सा किसी की भी पब्लिक इमेज खराब कर सकता है। गुस्से का प्रभाव सिर्फ संबंधों तक ही सीमित नहीं है। यह आपकी कार्यक्षमता पर भी बेहद नकारात्मक प्रभाव डालता है। गुस्से की समस्या के शिकार लोगों की स्मरणशक्ति व एकाग्रता क्षमता भी प्रभावित होती है। गुस्से को नियंत्रित करने के लिए ज्यादातर लोग धूम्रपान का सहारा लेने लगते हैं जिसमें सिगरेट व शराब आम हो चली है। तनाव को दूर करने के लिए इन दोनों ही चीजों का युवा पीढ़ी सबसे ज्यादा प्रयोग कर रही है। गुस्से की इस समस्या से निजात पाने के लिए पहले यह जानना जरूरी है कि आप गुस्से के किस स्तर तक पहुंच चुके हैं। इसका पता लगाने के लिए नीचे दिए गए तथ्यों पर गौर फरमाएं। अगर आप इन तथ्यों में से किसी एक के भी शिकार हैं तो समझिए आप गुस्से की बीमारी से ग्रस्त हो चुके हैं जिसका जल्द ही निदान नहीं किया गया तो यह आपके लिए घातक सिद्ध हो सकती है।
निषेध करना : निषेध यानी रोकना, यह मुख्यत: भावनाओं पर लागू होता है। अपनी भावनाओं को व्यक्त न करना भी हमें गुस्से की बीमारी तक पहुंचाता है। इस बात को उदाहरण के साथ समझते हैं, कभी-कभी ऐसी अवस्था आती है जब आपका कोई खास मित्र आपके जन्मदिन की बधाई देना भूल गया और इस बात से नाराज होकर आप मन ही मन उससे नाराज हो गये और बातचीत का सिलसिला बंद कर दिया। उसे अपनी नाराजगी का कारण बताए बिना आप अपने मन में गुस्से को दबाए रहे और समय के साथ यह गुस्सा लगातार बढ़ता चला गया। गुस्से की इस स्थिति को निषेध या रोकना कहते हैं। अपनी भावनाओं को व्यक्त न कर पाने वाले लोग अकसर ही इसके शिकार रहते हैं। गुस्से के इस प्रकार का सबसे ज्यादा प्रभाव आपसी संबंधों पर पड़ता हैै। हम उन लोगों को खो देते हैं, जो एक समय तक हमारे लिए बहुत खास हुआ करते थे। विशेषज्ञों की मानें तो गुस्से के इस प्रकार से निपटने का एक ही साधन है, ‘संवादÓ। संवाद यानी बातचीत एक ऐसी कला है जिसके जरिये बड़ी से बड़ी समस्या को हल किया जा सकता है। अपनी भावनओं को मन में रखकर उसे गुस्से के रूप में पनपने देने से अच्छा है इन्हें जाहिर कर दें। गुस्से का यह प्रकार किसी दूसरे को इतना प्रभावित नहीं करता जितना इससे ग्रसित व्यक्ति को करता है। भावनाओं को व्यक्त न करने वाले लोग अकसर डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं। इसलिए आपसी संबंधों को लेकर जब भी नाराजगी हो उसे फौरन व्यक्त कर दें, वरना यह उस संबंध को ही खत्म करने वाले गुस्से को जन्म देने के लिए काफी है।
अनियंत्रण : दिमाग को कुन्द कर देने वाला गुस्सा हम पर अपनी मर्जी चलाता है। इस मर्जी के तहत वह हमसे ऐसे काम करवा लेता है जिन्हें करने के बारे में सामान्य स्थिति में होने पर हम सोच भी नहीं सकते। गुस्सा हमें अनियंत्रित बना देता है। अनियंत्रण की इस समस्या के चलते हम ऐसे काम कर जाते हैं जो हर मायने में हमारे लिए नुकसानदेह हैं। कभी-कभी गुस्से से अनियंत्रित होना सामान्य प्रक्रिया मानी जा सकती है, लेकिन अकसर यही रवैैया अपनाना बीमारी के ही लक्षण हैं। यह हमारे स्वास्थ्य पर तो प्रभाव डालते ही हैं इसके साथ ही ये हमारी छवि को भी बिगाड़ते हैं। गुस्से के इस प्रकार पर विशेषज्ञों का कहना है, ‘जब आप गुस्से से फट पड़ते हैं तो यह सोचने में असमर्थ हो जाते हैं कि आप कहां हैं, किससे बात कर रहे हैं और क्या कर रहे हैं? लेकिन अपने गुस्से को व्यक्त किये बिना आपको चैन नहीं मिलता, भले ही उसका तरीका कुछ भी हो। सलमान खान और हरभजन सिंह इसी प्रकार के गुस्से से ग्रस्त हैं। अचानक आने वाला यह गुस्सा उन लोगों को अपना शिकार बनाता है जिनमें सहने की क्षमता नहीं होती। ऐसे लोग जीवन में किसी भी प्रकार की बाधा आने पर बहुत जल्दी ही इरिटेट या चिढ़चिढ़े हो जाते हैं और गुस्से में आकर कुछ भी कहने या करने से नहीं चूकते। यह गुस्सा आपके काम करने की लय और तरीके को भी प्रभावित करता है। इस तरह के गुस्से में आपका मस्तिष्क व तर्क-क्षमता काम करना बंद कर देती है। जिसके कारण हर चीज प्रभावित होती है। सामान्यत: इस प्रकार के लोग काफी महत्वाकांक्षी होते हैं जो खुद को बुलंदियों पर पहुंचाने व लोगों के बीच लोकप्रिय होने की ललक रखते हैं लेकिन अनियंत्रण की इस बीमारी से ग्रस्त होने के कारण उनकी महत्वाकांक्षाएं पूरी नहीं हो पातीं, जिसका उन्हें हमेशा अफसोस रहता है। ऐसे लोग दूसरों से भी काफी आशाएं रखते हैं और उन आशाओं के पूरा न होने पर गुस्से को जाहिर करते रहते हैं।
डिसप्लेसमेंट : गुस्से का यह प्रकार काफी भिन्न है। इसमें आप जिस व्यक्ति या कारण से नाराज होते हैं उस पर अपना गुस्सा न उतारकर दूसरे को भला-बुरा कहते हैं। गुस्से का यह प्रकार डिसप्लेसमेंट कहलाता है। उदाहरण के लिए अपने बॉस को अपनी सोच के बारे में बताने में असमर्थ होने पर आप अपना गुस्सा अपने ड्राइवर पर चिल्लाकर उतारते हैं। ऑफिस से घर की ओर ले जा रहे ड्राइवर को उसकी छोटी-छोटी गलतियों पर बुरी तरह झिड़क देना डिसप्लेसमेंट का लक्षण है। कभी-कभी गुस्से के इस प्रकार का शिकार आपके बच्चे और पत्नी भी हो जाते हैं। अधिकतर वह लोग जो गुस्से का स्थानांतरण करते हैं उन्हें इस बात का पता भी नहीं चलता। गुस्सा शांत होने पर ही वह यह समझ पाते हैं कि उन्होंने किसी का गुस्सा किसी और पर उतार दिया। कुछ लोग इसे निषेध करना मानते हैं लेकिन यह निषेध से काफी भिन्न है। निषेध में आप अपने गुस्से को किसी पर भी व्यक्त नहीं करते जबकि डिसप्लेसमेंट में गुस्सा किसी अन्य व्यक्ति पर उतर जाता है। आप इस गुस्से के इस प्रकार के शिकार हैं या नहीं, इसका पता तब ही चल पाता है जब कोई अन्य आपको उसी दौरान टोकता है। इस तरह के गुस्से में अगर फौरन कोई टोक दे तो इसे नियंत्रिात किया जा सकता है। डिसप्लेसमेंट नामक इस गुस्से को पहचानने के लिए किसी प्रकार के लक्षण नहीं हैं। इसे नियंत्रित करना गुस्से के अन्य कारणों की तुलना में काफी आसान है।
इस प्रकार के गुस्से से ग्रसित लोगों के लिए पारिवारिक सहयोग सबसे बड़ी जरूरत होती है।


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