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गहरे पानी पैठ

Posted On March - 21 - 2010

डा. ज्ञानचंद्र शर्मा

  • राम कथा सुंदर करतारी

तीन दिन बाद राम नवमी को रामचरित मानस की जयंती है। सम्वत् 1631 को अयोध्या में इसका प्रथम प्रकाश हुआ था। राम कथा युगों से लोकमानस में बसी हुई है। नाना पुराण निगम-आगम आदि में इसका वर्णन मिलता है। इसमें कुछ और अपनी ओर से मिलाकर गोस्वामी तुलसीदास ने अपने अंत:करण के सुख के लिए जन भाषा में प्रस्तुत किया है।
नाना पुराण निगमागम सम्मत
यद्रामायणे निगदितं क्वचिदन्योऽपि
स्वान्त: सुखाय तुलसी रघुनाथ
भाषा निबंधमति मंजुलमातनोति।

इस पद में दो बातें विशेष लक्ष्य योग्य हैं। ‘रामचरित मानस’ में राम की पारम्परिक कथा को दोहराया भर नहीं गया है, इसमें कुछ और भी जोड़ा गया है। वह ‘कुछ’ और  ही अधिक महत्वपूर्ण है। दूसरे रूढि़वादी लोगों के तीव्र विरोध के बावजूद इसकी रचना आम लोगों की समझ में आ सकने वाली सरल भाषा में की गई है जिसके लिए तुलसी को बहुत यातनाएं भी झेलनी पड़ीं। यह वह समय था जब राम को लेकर अनेक भ्रांतियां फैल गई थीं।
जब तीनों लोकों में राम दशरथ-सुत के रूप में जाने जाते हैं तो फिर राम-नाम का अन्य मरम क्या है? निर्गुणियों के अनुसार ब्रह्मï, अनादि, अनंत, अज, निगुर्ण, निराकार है। वह नरदेह में कैसे आ सकता है? तुलसी ने यह बात संशयग्रस्त सती के मुख से कहलवाई है।
ब्रह्मï जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
सो कि देह धरि होई नर जेहि न जानत बेद॥
इस पर शिव का कहना है कि जो तुम्हें इतना ही संदेह है तो स्वयं जा कर परीक्षा क्यों नहीं ले लेती?
जो तुम्हरे मन अति संदेहू तौ किन जाई परिच्छा लेहू।
सती ने परीक्षा ली और उसका परिणाम भी भोगा। पार्वती रूप में दोबारा जन्म लेने पर भी उसका संदेह बना ही हुआ है।
जो नृप तन्य तो ब्रह्मï किमि नारि विरह मति भोरि
देखि चरित, महिमा सुनत, भ्रमति बुद्धि अति मोरि।

पार्वती इस संशय के निवारण हेतु शिव से विनय करती है इस पर शिव जी बड़े सहज भाव से कहते हैं, हे भवानी! मोह वश भी कही गई तुम्हारी यह बात मुझे अच्छी नहीं लगी ‘तुम्हें जो कहा राम कोउ आना, जेहि स्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना।  यहां तुलसी ने कबीर की उक्ति ‘राम नाम को मरम है आना’ को लक्ष्य कर कहा है-मोह ग्रस्त अधम नर ही ऐसा कह सकते हैं—
कहहिं सुनहिं अस अधस नर ग्रसे जे मोह पिसाच।
पाखंडी, हरिपद विमुख जानहि झूठ न साच।

ऐसे व्यक्तियों को उन्होंने जीभर कोसा है। इस प्रसंग के अतिरिक्त तुलसी ने शायद ही कहीं शालीनता की सीमा का अतिक्रमण किया हो। उनका कहना है जिनको सगुण-अगुण के भेद का पता नहीं है वही ऐसी कल्पना करते हैं अन्यथा :
‘सगुनहिं अगुणहिं कहिं कुछ भेदा।
गावहिं मुनि, पुरान, बुध वेदा।’
अगुन अरूप अलख अज जोई।
भगत प्रेम वस सगुन सो होई

रामकथा की ताली से तुलसी ने संशय विहगों को उड़ाने
का यत्न है—
रामकथा सुंदर करतारी। संशय विहग उड़ावन हारी।
संशय का यह विहग देवलोक, ऋषि लोक, मानव और मानवेत्तर लोक, सर्वत्र दिखलाई पड़ता है जो ‘संदेह, मोह, भ्रम हरनी’ राम कथा की कृपा से ही दूर हो सकता है।
राम चरित कथन की परंपरा चिरकाल से चली आ रही है। पहले इसका रूप मौखिक रहा होगा। राम की राजसभा में इस कथा का गायन करने वाले लव-कुश उसी परंपरा की ओर संकेत करते हैं। आदि कवि वाल्मीकि ने इसे सबसे पहले आयामबद्ध किया। उनके पश्चात अनेक रूपों में इसका विकास हुआ जहां राम का चरित्रांकन विभिन्न प्रकार से हुआ है। तुलसी ने समन्वय करते हुए जो रूप उभारा है आज वही सर्वाधिक मान्य है। तुलसी के अनुसार सबसे पहले भगवान शंकर ने कृपा कर इसे उमा को सुनाया। फिर इसका ज्ञान काक भूशुण्डी को दिया। उससे ऋषि यज्ञवल्क्य ने प्राप्त किया। जिन्होंने इसे ऋषि भारद्वाज को सुनाया। इस प्रकार श्रोता-वक्ता की परंपरा से इस कथा की धारा अविरल बहती रही। इसको तुलसीदास ने शूकर क्षेत्र में अपने गुरु से सुना था। यद्यपि उन्होंने बार-बार इसे दोहराया परंतु तब तुलसी की बालबुद्धि में इसका अर्थ स्पष्टï नहीं हुआ था। समझ में आने पर उन्होंने इसे अवधी भाषा में रूपांतरित किया।
अब तक संस्कृत में ही प्रचलित राम कथा को सरल जन भाषा में प्रस्तुत करना तुलसीदास का एक अत्यंत साहसिक और क्रांतिकारी कदम था जिससे वह घर-ïघर में पहुंची और जन-जन की आत्मिक शक्ति का स्रोत बनी। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम चरण में गिरमिटिया बनाकर मारिशस, फिजी, ट्रिनीडाड इत्यादि देशों में ले जाए गए भारतीय मजदूर अपने साथ रामचरित मानस की एक प्रति ले जाना नहीं भूले थे। यही उनको अपने इस देश से जोड़े रही। आज उन देशों में रामकथा का जो प्रचलन इन्हीं के कारण है।
‘राम चरित मानस’ राम-कथा का वर्णन मात्र नहीं है बल्कि इसके माध्यम से राम के एक नवीन रूप का सृजन हुआ है। जहां वह नर तन में होते हुए भी ईश्वरीय लीलाएं दिखलाते हैं। उनकी यह छवि जनमन में कुछ इस तरह बैठ गई है कि उसमें किसी प्रकार का कोई परिवर्तन उसे स्वीकार्य नहीं है।  राम के संबंध में मैथिलीशरण गुप्त की एक निष्ठï धारणा है-
राम तुम मानव हो, ईश्वर नहीं हो क्या।
विश्व में रमे हुए सभी कहीं नहीं हो क्या।
तो मैं निरीश्वर हूं ईश्वर क्षमा करे
तुम नहीं तो मन मेरा तुम में रमा करे।

‘मानस’ की रचना की प्रेरणाशक्ति तुलसी की लोक मंगल की भावना  रही है। उनेक राम ‘मंगल भवन अमंगल हारीÓ है वह दुष्टïों का संहार कर पृथ्वी पर धर्म की स्थापना के लिए अवतरित हुए हैं। वह मर्यादा पुरुषोत्तम हैं जो सभी उच्च आदर्शों का पालन करने वाले हैं।
यह मानव जीवन की आचार-संहिता है और अपने समय के समाज का ज्ञान कोष।
जिसके अवगाहन के लिए निर्मल बुद्धि की अनिवार्यता है।
अस मानस मानस चष चाही!
भई कवि बुद्धि विमल अवगाही।


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