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गजलें

Posted On March - 13 - 2010

चांद हो चांदनी हो और क्या हो मेरे लिए,
प्यास बुझा जाती है जैसे घटा हो मेरे लिए।
दर्द से सींचा जिसे धड़कन से संवारा है जिसे,
ऐसे माहौल में उगता हुआ बूटा हो मेरे लिए।
तुम तो बस तुम हो, नहीं तुम सा कोई जहां में,
सारे जहां को समेटकर दिल बना लिया है मेरे लिये।
तुम्हारे होने से बहार, न होने से पतझर है,
तुम ही मेरी उम्मीद, मेरी वफा का सिला मेरे लिये।
कैसे उड़े आजाद परिंदा, अपनी परवा लेकर,
तुम हो आकाश और आकाश पर हवा मेरे लिए।
-डा. शशिकांत कपूर
क्यों मोहब्बत मुझसे पहली-सी वो अब करता नहीं,
सर मेरे शाने पे अब दिलबर मेरा धरता नहीं।
बेव$फा लाखों मिले पर कोई तुझसा न मिला,
की ज$फा जिस तरह तूने, यंू कोई करता नहीं।
वो सितमगर रात-दिन रखता है खंजर हाथ में,
जाए वो उसकी गली जो मौत से डरता नहीं।
दिल सता मत मुझको वर्ना मार डालूंगा तुझे,
याद करता है उसे क्यूं भूलता-मरता नहीं।
डालिएगा चाहे जितनी आर•ाुओं की शराब
दिल वो पैमाना है यारो जो कभी भरता नहीं।
$गम के तूफां में जो फंसकर बच गया जिंदा ए ‘दीपÓ
फिर किसी तूफान से वो आदमी डरता नहीं।
-डा. दीप बिलासपुरी


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