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खबरों की विश्वसनीयता

Posted On March - 9 - 2010

लोकसभा चुनाव और कई राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान कतिपय समाचारपत्रों द्वारा राजनेताओं द्वारा प्रायोजित खबरों को एडिटर गिल्ड तथा स्वच्छ पत्रकारिता के पक्षधरों ने गंभीरता से लिया और इस कृत्य की निंदा की गई। लेकिन इस सारे प्रकरण को लेकर एक बात सामने जरूर आई कि यदि प्रेस कौंसिल अधिकार-संपन्न संस्था होती तो दोषियों के खिलाफ समय रहते कारगर कार्रवाई हो पाती। वास्तव में प्रेस कौंसिल एक ऐसी संस्था बनकर रह गई है जो पत्रकारिता की मर्यादा के उल्लंघन पर सिर्फ चेतावनी देने, निंदा करने और सिर्फ सलाह देने की भूमिका तक सीमित होकर रह गई। अब सरकार भी स्वीकार कर रही है कि प्रेस कौंसिल  को अधिकारसंपन्न बनाकर पत्रकारिता जगत में उग आई खरपतवार की सफाई का दायित्व सौंपा जाए। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में स्वीकार किया कि चुनाव के दौरान प्रायोजित खबरों के पुख्ता प्रमाण मिले हैं जिसमें कई राजनीतिक दलों से पैसे लेकर कुछ खबरों का प्रकाशन हुआ है। उन्होंने इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की वकालत की है। उम्मीद की जानी चाहिए कि ‘पेड न्यूजÓ की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने की दिशा में सूचना-प्रसारण मंत्रालय कोई पारदर्शी नीति बनाएगा जो पत्रकारिता की अस्मिता व गरिमा के अनुकूल भी हो।
इसमें दो राय नहीं कि आज़ादी के बाद पत्रकारिता का व्यावसायीकरण तेजी से हुआ है। आज़ादी से पूर्व जहां पत्रकारिता का उद्देश्य देश की आज़ादी हासिल करना था, वहीं स्वतंत्रता के बाद कोई ठोस लक्ष्य सामने नहीं था। यद्यपि आर्थिक आज़ादी व समतामूलक समाज की स्थापना सेे जुड़े तमाम मुद्दे सामने थे, लेकिन पत्रकारिता जगत में उद्देश्यों को लेकर स्पष्टïता व एकरूपता नजर नहीं आयी। आज़ादी के आंदोलन के दौरान जो पत्रकारिता ऋषि-कर्म सरीखी थी, कालांतर में अखबार मालिकों के लिए मुनाफा कमाने तथा पत्रकारों के करिअर बनाने व सत्ता की सुविधाओं में भागीदारी का माध्यम बन गई। स्वच्छ पत्रकारिता के लिए जो आत्मानुशासन जरूरी था, कालांतर  में धीरे-धीरे उसका क्षरण होने लगा। पत्रकारिता के उच्च मानदंडों  की स्थापना एवं विश्वसनीयता की निगरानी के लिए जिस प्रेस कौंसिल की स्थापना की गई, उसके पास कार्रवाई करने तथा दंड देने का अधिकार न था। अत: पत्रकारिता जगत की काली भेड़ें निरंकुश होकर काम करने लगीं। यही वजह है कि एक कारगर नियामक संस्था की आवश्यकता महसूस की जाने लगी है। अब यदि सरकार वास्तव में इस दिशा में गंभीर है और वह ऐसी कौंसिल को अधिकारसंपन्न बनाना चाहती है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि पत्रकारिता जगत में उभर आई विद्रूपताओं का सफाया किया जा सकेगा। पिछली सरकारों की इस दिशा में बरती गई उदासीनता का ही परिणाम था कि चुनावों के दौरान खबरों की विश्वसनीयता को लेकर सवाल खड़े होते रहे हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि भविष्य  में इसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी।


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