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किसके द्वारा, किसके लिए, किसकी सरकार!

Posted On March - 10 - 2010

दरअसल

राजकुमार सिंह
लोकतंत्र की प्रचलित परिभाषा है : जनता के द्वारा, जनता के लिए, जनता की सरकार। सरकार के गठन की प्रक्रिया तक यह परिभाषा प्रासंगिक भी नजर आती है, पर उसके बाद सरकारों के कामकाज के संदर्भ में भी यही बात उतने दावे के साथ नहंी कही जा सकती। सरकारों के कई काम-फैसले ऐसे होते हैं,जिन्हें जनहित में या व्यापक जनहित में जरूरी नहीं ठहराया जा सकता। अगर लोकतंात्रिक ढंग से निर्वाचित सरकारें ऐसे फैसले लेती हैं जो व्यापक जनहित में नहीं होते तो ये जनविरोधी फैसले किसी न किसी के हित में लिये ही जाते होंगे। वे कौन लेाग या वर्ग हैं और आम आदमी की बात करने वाली सरकारें अचानक उनके प्रति ज्यादा संवेदनशील क्यों हो जाती हैं?
सीधे मुद्दे पर आते हैं और बात देश की सरकार की ही करते हैं, क्योंकि राज्य सरकारों का भी हाल कमोबेश यही है। पिछले दिनों मनमोहन सिंह सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल का दूसरा केंद्रीय बजट पेश किया। जिस दिन केंद्रीय वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने यह बजट पेश किया, उससे एक दिन पहले ही संसद में बेलगाम महंगाई पर गरमागरम बहस हुई। सरकार को बिना मांगे ही बाहर से समर्थन दे रहे समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल सरीखे दलों ने भी विपक्ष के साथ-साथ सरकार को महंगाई के लिए जिम्मेदार ठहराया, पर सरकार ने कम उत्पादन और अचानक अमीर हो गये लोगों की बढ़ती मांग के साथ-साथ खराब मानसून के सिर ठीकरा फोड़ा।
सरकारी आंकड़े तो यही बताते हैं कि आर्थिक उदारीकरण के लगभग दो दशकों में गरीबों की संख्या ही लगभग 10 करोड़ और बढ़ गयी है। ऐसे में अचानक कौन अमीर हो गया है और क्या अमीर होने के बाद कोई दोगुना भोजन करने लगता है—इसका खुलासा अभी तक सरकार ने नहीं किया है। फिर भी यह तो जगजाहिर है कि यह महंगाई किसी एक मानसून की विफलता का नतीजा नहीं है। कम से कम वर्ष 2008 से तो महंगाई सुरसा के मुंह की तरह फैलती ही जा रही है। पंद्रहवीं लोकसभा के समय को अपवाद मान लें तो यह भी कटु सत्य है कि महंगाई पर नियंत्रण में सरकार पूरी तरह नाकाम साबित हुई है।
इसमें दो राय नहीं कि पिछले साल देश का एक बड़ा हिस्सा सूखे की चपेट में रहा। यह भी सही है कि मानसून और सूखा सरीखी प्राकृतिक स्थितियों पर किसी भी सरकार का वश नहीं चलता, पर संभावित उत्पादन और मांग के बीच संतुलन बिठाने के लिए जरूरी कदम उठाना तो सरकार की ही जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी के निर्वाह के लिए मनमोहन सिंह सरकार ने क्या किया? नहीं, यह जवाब नहीं जिम्मेदारी से पलायन ही माना जायेगा कि कृषि, खाद्य आपूर्ति और उपभोक्ता मामलों समेत सभी संबद्ध मंत्रालय सहयोगी दल राकांपा के मुखिया शरद पवार के पास थे।
जैसा कि दावा किया गया था और यह गलत भी नहीं लगता कि पंद्रहवीं लोकसभा के चुनावों में मतदाताओं ने मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्वकाल के पक्ष में ही जनादेश दिया था-भले ही वह विकल्पहीनता का परिणाम रहा हो। फिर मंत्रियों का चयन और उनके बीच विभागों का बंटवारा भी प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि संसदीय लोकतंत्र में मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी होती है। इसलिए किसी मामले में सरकार की सफलता या विफलता भी सामूहिक रूप से स्वीकार की जानी चाहिए।
इसलिए अगर सरकार वर्ष 2007 से ही संभावित उत्पादन और मंाग का सही आकलन कर संतुलन बनाये रखने में नाकाम रही, और न सिर्फ नाकाम रही, बल्कि कम उत्पादन के संकेतों के बावजूद चीनी और चावल का निर्यात भी कर आत्मघाती कदम उठाती रही तो फिर मानसून और सूखा के सिर ठीकरा फोडऩा तो अपना निकम्मापन छिपाने की ही कोशिश मानी जायेगी। एक क्षण के लिए मान लें कि ये तमाम गलतियां शरद पवार की रहीं तो फिर प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह का दायित्व क्या मूकदर्शक बने रहना ही था?
माफ कीजिए, इस नाकामी को गठबंधन धर्म की आड़ में नहीं छिपाया जा सकता। अगर सरकार बचाये रखने के लिए आपने जन विरोधी काम-फैसले होने दिये तब तो और भी आपत्तिजनक है,क्योंकि सरकार की खातिर समझौते यहीं रुक जायेंगे, इसकी कोई गारंटी नहंी है। ये ऐसे सवाल हैं, जिनका केंद्र सरकार या उसका नेतृत्व कर रही कांग्रेस की ओर से कोई जवाब नहंी आया है। इन दोनों की ओर से एक ही जवाब आता है कि वे महंगाई पर चिंतित हैं और उस पर नियंत्रण के लिए हरसंभव कदम उठा रहे हैं।
दरअसल यही चिंता और आश्वासन महंगाई पर संसद में बहस के जवाब में भी सुनाई दिये। इसीलिए उम्मीद बंधी कि महंगाई पर चिंतित सरकार कम से कम महंगाई बढ़ाने वाला बजट तो पेश नहीं ही करेगी, पर यह उम्मीद एक रात से ज्यादा नहीं टिकी। अगले दिन जब प्रणब मुखर्जी ने बजट भाषण पढऩा शुरू किया तो उम्मीद रेत के घरौंदे की तरह धराशायी होती गयी। पिछले दो वर्षों में खासकर खाद्य वस्तुओं की कीमतें जिस तरह कई गुना बढ़ गयी हैं और मध्यमवर्गीय व निम्न वर्गीय परिवारों का घरेलू बजट ही गड़बड़ा गया है, उसके मद्देनजर इन वर्गों को राहत देने वाले बजट प्रावधानों की अपेक्षा भी अनुचित नहीं थी, पर हुआ क्या?
मध्यम वर्ग की सबसे बड़ी आकांक्षा आयकर राहत की रहती है। मनमोहन सिंह सरकार कह सकती है कि उसने इस बार आयकर स्लैब में बदलाव किया है। बेशक किया है, पर यही बदलाव तो उसकी प्राथमिकताओं पर भी सवालिया निशान लगा देता है। कर मुक्त आय की सीमा जहां एक लाख साठ हजार रुपये ही रहने दी गयी है, वहीं 10 प्रतिशत आयकर वाली आय की सीमा तीन लाख से बढ़ा कर पांच लाख रुपये कर दी गयी है। अभी तक तीन लाख से पांच लाख तक की आय पर 20 प्रतिशत आयकर लगता था। इसी तरह पांच लाख से ऊपर की आय पर जहां अभी 30 प्रतिशत आय कर लगता है, उसे घटा कर 20 प्रतिशत कर दिया गया है। अब आठ लाख से अधिक आय पर ही 30 प्रतिशत आयकर देना पड़ेगा।
साफ है कि नये आयकर स्लैब से कम आय वालों को कोई लाभ नहीं होगा,जबकि जिसकी जितनी ज्यादा आय होगी, उसे उतना ही ज्यादा लाभ होगा। यह तो सामान्य ज्ञान की बात है कि महंगाई की मार एक लाख साठ हजार रुपये तक वार्षिक आय वालों पर तीन लाख रुपये वार्षिक आय वालों से ज्यादा पड़ी होगी। फिर भी अगर मनमोहन सरकार ने तीन लाख रुपये से ज्यादा आय वालों को ही राहत देना जरूरी समझा तब तो यह स्वाभाविक सवाल उठेगा ही कि आखिर यह किसके द्वारा किसके लिए किसकी सरकार है?
1991 में पीवी नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्वकाल में बतौर वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने जब आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की थी तो देश का कायाकल्प हो जाने के सपने दिखाये गये थे, पर लगभग दो दशक बाद का सच यह है कि इस देश में लगभग 40 करोड़ लोगों की दैनिक आय 22 रुपये या उससे भी कम है और इस बीच गरीबों की संख्या 10 करोड़ बढ़ गयी है। कभी कहा जाता था कि दाल-रोटी खाओ, प्रभु के गुण गाओ, पर आज तो दाल और चीनी मध्यमवर्गीय परिवार की थाली से भी बाहर हो गयी है, फिर गरीब क्या खाये?
सरकार ने महंगाई कम करने के लिए तो कोई ठोस कदम उठाये नहीं, उलटे बजट प्रावधानों से पेट्रोल-डीजल महंगा कर दिया। प्रधानमंत्री इसे अर्थव्यवस्था के दूरगामी हितों की मजबूरी बता रहे हैं। अकसर महंगाई पर चिंतित हो कर प्रधानमंत्री को पत्र लिखने वाली कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाांधी भी उनसे सहमत हो गयी हैं, पर यह कोई नहीं बताता कि गरीब को उसकी क्रयशक्ति के अंदर दो वक्त क ा भोजन उपलब्ध हो, यह सुनिश्चित करना किसकी जिम्म्ेादारी है? अर्थव्यवस्था के दूरगामी हितों की जो भी दरकार हो, पर देश के आम आदमी, जिसके नाम पर यह सरकार चुन कर आयी है, उसकी जरूरत तो रोजी-रोटी है,जो सरकार उसे उपलब्ध नहीं करा पा रही।
पेट्रोल दो रुपये 58 पैसे महंगा होने का असर तो सिर्फ उन्हीं लोगों के घरेलू बजट पर पड़ेगा, जो निजी वाहन इस्तेमाल करते हैं, पर डीजल के मूल्य में दो रुपये 67 पैसे की वृद्धि से तो बस किराये से लेकर माल भाड़ा तक सब कुछ बढ़ जायेगा, जिसका परिणाम खाद्य पदार्थों से लेकर सभी उपभोक्ता वस्तुओं के और भी महंगे होने के रूप में सामने आयेगा। अगर भारी भरकम बजट वाली देश की सरकार अंतर्राष्ट्रीय बाजार का दबाव कुछ और समय बर्दाश्त नहीं कर सकती तो रोज कुआं खोदकर पानी पीने वाला आम आदमी उस बोझ को कैसे बर्दाश्त करेगा? देशवासियों की अर्थव्यवस्था चौपट कर देश की अर्थव्यवस्था मजबूत करने के ऐसे विचित्र प्रयोग सकारात्मक परिणाम तो नहीं दे सकते।


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