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कविताएं

Posted On March - 21 - 2010

एक शबनमी सुबह
नभ से टपककर आ गई
एक और सुबह
एक सुबह शबनमी
फैल गई अफवाह सी
गंध…
हर श्रृंगार की
सब जगह।
शिशिर का कातर करुण स्वर
उड़ा इधर उधर
हलद पांखियों संग
सूरज बरसाने लगा बस्ती में
जागृति का रंग।
झील शांत है- पर
बोल रही कितने
अनकहे बोल
पवन पूछ रही पीपल के पत्तों से
स्पंदन का मोल।
धूप की चिरैया
मुंडेर पर उड़ आई
किरनों ने विदा किया
ठिठुरन को-कहती ‘गुडबाईÓ
चमचम पीतल के कुंभ लिए
घूम रही पगड़ी केशरिया
ठौर ठौर बांट रही दूध
कोई
रूप की अनुक्रमणिका।
धानी घूंघट से निरख रहा
नयन एक कोई
मन की फुलबगिया में किसने
स्नेहलता बोई?
घर में, आंगन में, बगिया में
क्यारी में- बरस गई
कुंदन की किरन किरन
कामकाज करने को
निकल पड़े
हर चौखट से चरन चरन।
-देवदत्त वाजपेयी

ब्रेकिंग न्यूज़
एक भयंकर तूफान के बाद
क्षत-विक्षत हुए कुछ शव
बिखरे पड़े
कुछ कपड़े, कुछ बर्तन
एक फोटो किसी बच्चे की,
शहर के व्यस्ततम चौराहे पर
हुई हत्या…
घर के सुरक्षित कोने में
हुआ बलात्कार
अपनों का ही…किसी अपने के द्वारा,
खंडहर हुई
वर्षों पुरानी सभ्यता-संस्कृति
गांव-खेत-खलिहान…
टूट कर बिखरे रिश्ते-नाते
और भी बहुत कुछ
टूटा-बिखरा
बनने को था जो
कुछ अच्छा…अभी-अभी
और…इन सब को कैद कर कैमरे में अपने
सबसे पहले…
परोस कर दर्शकों के सामने
सबसे आगे, बनाया जाता है
ब्रेकिंग न्यूज़
सेटेलाइट युग के
आधुनिक खबरिया चैनलों द्वारा
आज के समय में…।
– जगमोहन आज़ाद

अर्थ
परिभाषाओं के अर्थ
सदा एक से नहीं होते
परिभाषाओं के अर्थ
सदा बदलते रहते हैं
जिस तरह चेहरों के रंग।
परिभाषाओं के अर्थ का
सदा एक-सा होना
जरूरी भी नहीं
शायद इसीलिए कि हम
अच्छी तरह जानते हैं
परिभाषाओं के एक से अर्थ
सदा एक के अनुकूल
नहीं हो सकते।
उसे अनेक अर्थों की
कला में ढालने में
हम सब माहिर हैं।
अब यह अंतर
कर पाना मुश्किल है
कि परिभाषाओं के अर्थ
बदल गए हैं
या फिर परिभाषाएं
अर्थहीन हो गई हैं?
-मोहन सिंह रावत


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