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आपके पत्र

Posted On March - 9 - 2010

विभाजन का दर्द

राकेश बाबू, कलायत
22 फरवरी को विश्वनाथ सचदेव का लेख—’नक्शे नहीं बांट सकते साझी संस्कृति’ पढ़ा। लेखक ने हृदय को छू लेने वाला लेख लिखा। सच्चाई यही है कि राजनीति ने बेशक इस भूखंड के दो टुकड़े कर दिये हों, लेकिन आज भी दोनों देशों की जनता एक-दूसरे को सांस्कृतिक स्तर पर काफी नजदीक महसूस करती है। दोनों ही देशों के प्रसिद्ध शायर हों या लेखक, गायक हों या रंगकर्मी-एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। भारत के अनेक कलाकारों, गायकों और लेखकों को पाकिस्तान की जनता भी बेहद पसंद करती है। मेहंदी हसन का भारत में इलाज-खर्च पर मदद की पेशकश करके भारत कोकिला लता जी ने एक मिसाल पेश कर दी है। भारत-पाकिस्तान के विभाजन का दर्द आज भी दोनों ही देशों की अधिकांश जनता के दिल में है। दोनों ही देशों के अनेक लेखकों ने तो इस दर्द को और भी शिद्दत के साथ महसूस किया है।

शिक्षा में सुधार आवश्यक

सोहन लाल सिखवाल, इंदौर
मानव संसाधन विकास मंत्री द्वारा शिक्षा में सुधार के किए जाने वाले प्रयास सराहनीय हैं। हमारे देश में शिक्षा के वर्तमान स्वरूप में अनगिनत कमियां विद्यमान हैं। अत: आज शिक्षा के बारे में एक राष्ट्रीय समग्र नीति क्रियान्वित की जानी चाहिए। प्रारंभ से अंत तक शिक्षा के चरण एक कड़ी से बंधे हों तो हमारी शिक्षा की गुणवत्ता को और अधिक सार्थकता के साथ आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। शिक्षा के सुधार में राज्यों की भूमिका भी महत्वपूर्ण स्थान रखती है।

सांस्कृतिक मूल्यों की उपेक्षा

श्रीमती केरा सिंह, नरवाना
किसी भी समाज की वास्तविक उन्नति केवल भौतिकवादी पक्ष से नहीं नापी जा सकती। जरूरी यह है कि उसमें रहने वाले लोग अपनी जड़ों से कितने जुड़े हैं क्योंकि वही किसी समुदाय की वास्तविक पहचान है। भौतिकवाद की अंधी दौड़ में हम अपने स्थायी सांस्कृतिक मूल्यों की उपेक्षा कर रहे हैं। हमारा खान-पान, हमारी वेषभूषा और रीति-रिवाज आज संक्रमण के दौर से गुजर रहे हैं। हम पश्चिम की नकल में अपने अध्यात्म के महात्म्य को नहीं पहचान पा रहे। हमारी वर्तमान पीढ़ी का दायित्व बनता है कि जब भी अवसर मिले युवा वर्ग को सांस्कृतिक चेतना के आलोक में आने का अवसर दें। आज तथाकथित आधुनिकता के नाम पर हमारे स्थायी सामाजिक संगठन टूटने के कगार पर आ पहुंचे हैं। विवाह और परिवार के बिखराव को हम सहजता से नहीं ले सकते। तलाक की बढ़ती संख्या को हम आधुनिकता के नाम पर नहीं निगल सकते। आज पुन: स्थायी धार्मिक और आध्यात्मिक मूल्यों में प्राण फूंकने की आवश्यकता है।

साइबर हमला

कृष्णराम देवले, इंदौर
चीन द्वारा साइबर हमला करने की कोशिश तथा अपने प्रतिस्पर्धी देशों के कंप्यूटरों को हैंग करके गोपनीय जानकारी चुराने का इतिहास रहा है। 2007 में अमेरिका के प्रतिरक्षा मुख्यालय पेंटागन और विश्व बैंक की वित्तीय सूचना प्रणाली पर भी चीन से साइबर हमले हुए। ऐसे हमलों का एक मात्र तोड़ यह है कि हम अपने कंप्यूटर सिस्टम की सुरक्षा को इतना मजबूत और बहुआयामी बनाएं कि कोई भी उसमें सेंध न लगा सके। भारत की साफ्टवेयर और सूचना प्रौद्योगिकी विश्व में सर्वोत्तम है, उसे और मजबूत करना होगा।

पत्थरमार होली

ओ.पी. कौशिक, ढकोली
राजस्थान के आदिवासी बहुल जि़ले में देवी की खुशी की आड़ में पत्थरमार होली खेली जाती है। स्थानीय बोली में इसे राड कहा जाता है। राड में घायल होने वाले   को भाग्यशाली मानते हैं। किंवदंती है कि जितना अधिक खून बहेगा अगला साल उतना ही अच्छा गुजरेगा। विज्ञान के युग में ऐसा व्यवहार समझ से परे है। इस खतरनाक परंपरा को पुण्य मानना कहां की बुद्धिमता है? सरकार को इस सामाजिक अंधविश्वास के उन्मूलन के लिए उपाय करने चाहिए।

साहित्य को स्थान दें

डॉ. आरडी बिबयान, कैथल
पत्रकारिता एक पवित्र एवं प्रतिबद्धता से परिपूर्ण मिशन है। आज धन-लोलुपता की चूहा-दौड़ में शामिल कुछ अखबार अपनी मर्यादाएं भूल गए हैं। अश्लील चित्र विशेष पृष्ठों पर परोसे जाते हैं जिनकी चपेट में हमारा अपरिपक्व युवा वर्ग फंस जाता है। उधर, साहित्य जो समाज की तसवीर दिखाता है, मार्गदर्शन करता है। शब्द शक्ति, ब्रह्मï शक्ति, ब्रह्मानंद-सहोदर : ‘शब्द’ को ही यानी साहित्य को अखबारों से निर्वासित कर दिया है। अच्छे-बुरे साहित्य का भेद कहां? इस चौथे लोक स्तम्भ के पहरेदारों से गुजारिश है कि वे साहित्य को समुचित स्थान दें। पत्रकारिता के मिशन को समझें व राष्ट्र-यज्ञ में अपनी ईमानदारी की आहुति डालकर दूषित माहौल को स्वच्छ बनाने का भरसक प्रयास करें।

अल्पसंख्यकों को खतरा

प्रो. शामलाल कौशल, रोहतक
23 फरवरी का संपादकीय ‘अमानवीयता की हद’, में पाकिस्तान के सीमांत उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र में तालिबान आतंकवादियों द्वारा सिखों के सिर कलम कर देने से यह संदेश मिला कि वहां अल्पसंख्यकों को खतरा है। आज वहां अल्पसंख्यक लोग नारकीय जीवन व्यतीत कर रहे हैं। कुछ समय पहले सिखों से जजिया कर लिया गया। लगभग 10 सिखों का आतंकवादियों ने अपहरण कर  लिया तथा 3 करोड़ की फिरौती न देने के कारण उनमें से चेतावनी के तौर पर दो का सिर धड़ से अलग करके फेंक दिया गया। वहां कोई भी सरकारी फरमान को नहीं मानता। लेकिन अफसोस की बात है कि अब सिखों के पाकिस्तान में इस तरह से बेदर्दी से मारे जाने पर लगभग खामोशी है। सरकार को इस ओर कड़ा रुख अपनाना चाहिए।


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