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आना-जाना बसंत का

Posted On March - 10 - 2010

सागर में गागर
राजेंद्र निशेश
अरे भइया! बसंत आया और चला भी गया। हमें तो पता भी नहीं चला कि कब आया और कब भोर के सपने की तरह चला गया। ऐसे भी कोई आता है दुबके से कि एक पत्ता तक न हिले और चुपचाप दबे पांव वापस चला जाये। कोई हलचल नहीं; कोई कोलाहल नहीं, जैसे पूरा देश चिरनिद्रा में पड़ा हो। बाग-बागीचे में देखा, लाल-पीले-नीले फूलों का नामोनिशान नहीं। तितली, भंवरा, कोयल, अमराई सभी कुछ गायब, भला ऐसा भी कभी बसंत होता है। न कोई अनुभव, न कोई उत्सव, ऐसे बसंत को तो लानत ही भेजी जा सकती है।
अरे भइया, हम तो पहले से ही डरे हुए हैं, न जाने कहां धमाका हो जाए, न जाने कब सुनामी आ जाए। रात को भी डरावने सपनों की शैया पर ‘त्राहिमाम्-त्राहिमाम्Ó का पाठ रटते रहते हैं। सरकार स्वयं डरी हुई है। हकलाते हुए कहती है कि भइया, आतंकवाद से सावधान, आतंकवादी कहीं भी कुछ कर सकते हैं। अपनी रक्षा स्वयं करना सीखो। महंगाई और भी बढ़ सकती है, पेट पर पत्थर बांधना सीखो। मीडिया वाले डराते हैं कि क्यामत का दिन नजदीक है। कभी यूएफओ, कभी एलियंस की दस्तक, कभी कोई धरती की तरफ आता उल्कापिंड, कभी आकाश में विस्फोट हमें भय की नदी में डाल देता है। ऐसे में अगर तुम अपनी थोड़ी-सी आभा बिखेर जाते तो तुम्हारा क्या जाता? प्यारे बसंत, हम भी चार खिले हुए फूल देख लेते, अभी तक तो मुरझाये हुए ही देखते आ रहे हैं। महबूब को अगर अपनी माशूका की एक झलक भी मिल जाए तो उसके मुर्दा शरीर में संजीवनी का काम करती है। आह! लेकिन तुम तो बेवफा प्रेमिका की तरह निष्ठïुर निकले।
लगता है कि आदमी की प्रवृत्ति की तरह प्रकृति का समय-चक्र  भी बदल रहा है। उसमें भी विसंगतियां उभर आई हैं। कभी ग्रीष्म वर्षा की टांग खींचने लगता है, कभी सर्दी बसंत पर सिंह-सवारी करने लगती है। वैसे भी सब का अपना-अपना समय होता है, अपना-अपना बसंत होता है। बाबू मुसद्दी लाल का बसंत तो हर वर्ष मार्च महीने में होता है, जब सरकारी बजट का ओम-नमो स्वाह करना होता है। मास्टर दीनानाथ का बसंत पूरे वर्ष होता है, जब उनके पास ट्यूशनों का दौर चलता है। सरकार की तनख्वाह में क्या पड़ा है, समझो पेंशन है, बैंक में पड़े-पड़े ही शोभा देती है। भ्रष्टïाचार की बगिया में तो हरे-भरे नोटों के फूल सदा खिलते रहते हैं। पतझड़ तो कड़की वालों का होता है। उनका बंसत तो पूरा वर्ष रूठा-रूठा  सा रहता है। सिफारिश, जोड़-तोड़ के बगीचे में उन्हीं के अरमानों के फूल खिलते हैं जो वक्त की धारा के साथ बहना जानते हैं। इस आर्ट में सिद्धहस्त सभी नही होते। कुछ अनाड़ी तरह के लोग भी होते हैं जो नदी के किनारे खड़े लहरों को गिनने का काम करते रहते हैं। कुछ को छोड़, शेष के लिए शून्य धरा है। वास्तव में ही हम शून्य के कालचक्र में घूम रहे हैं। इस शून्य का विस्तार अनन्त है, अबाध है। राजा शून्य की स्थिति में है, प्रजा शून्य की स्थिति में है, फिर भी सब कुछ चल रहा है। इससे लगता है कि श्रीभगवान्ï कहीं हैं तो सब कुछ देख रहे हैं और देखकर भी असहाय स्थिति में हैं। उसने तो बसंत भेजा था, लेकिन बीच में ही गेंद की तरह लपक लिया गया। बसंत न हुआ कि क्रिकेट की बाल हो गई जो पीछे खड़े विकेटकीपर द्वारा लपक ली जाए और बॉलर अपनी बगलें झांकता रह जाए। उधर प्रगति का आलम यह है कि नान-स्टॉप रेलगाड़ी कहीं भी रुककर सुस्ताने लगती है या पटरी से उतर कर डराने लगती है। सरकारी मोटर कहीं भी हकलाने लगती है। बिजली रानी कभी भी रूठकर परदे की ओट में चली जाती है। सड़क है कि कभी भी चोरी हो जाती है। बम-विस्फोटों और बम-वर्षाओं से लेकर कारखानों तक में प्रदूषण फैलाने की क्षमता में चार-चांद लग चुके हैं। महंगाई जार-जार रुलाती है।
उधर सरकार है जो कम्बली ओढ़ कर सो रही है, बेसुध! अरे भइया, ऐसी भी क्या नींद जो बसंत के आगमन पर भी न टूटे और उसे पता भी नहीं चले कि बसंत आना था कभी लोगों के जीवन में। महंगाई  से लोगों की सांसें तक उखड़ रही हैं। सरकार कोरे आश्वासनों की चाशनी लोगों को चटाती है और फिर सो जाती है कुम्भकर्णी नींद में! ऐसे में तुम बहुत याद आओगे, बसंत।


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