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आधी आबादी का अधिकार

Posted On March - 11 - 2010

सौवें अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर न सही, पर उसके अगले दिन भारत की महिलाओं को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में आरक्षण का तोहफा कमोवेश मिल ही गया। भारतीय संसद के उच्च सदन राज्यसभा ने मंगलवार की शाम इसे एक के मुकाबले 186 के भारी बहुमत से पारित कर दिया। पिछले लगभग डेढ़ दशक से दलगत राजनीति के चक्रव्यूह में फंसे महिला आरक्षण विधेयक की यह बड़ी छलांग है। कह सकते हैं कि कानून बनने के लंबे सफर का पहला पड़ाव उसने पार कर लिया है। अब उसे लोकसभा की कसौटी पर भी खरा उतरना होगा। इस महिला आरक्षण विधेयक का मौजूदा स्वरूप में विरोध करने वाले दलों की सदस्य संख्या राज्यसभा के मुकाबले लोकसभा में ज्यादा प्रभावी है। इसलिए विधेयक को लोकसभा में पारित करवाना राज्यसभा के मुकाबले मुश्किल भी हो सकता है, पर जिस तरह भारतीय राजनीति के तीनों बड़े धु्रव कांग्रेस, भाजपा और वाम मोर्चा खुलकर इस विधेयक का समर्थन कर रहे हैं, उसके चलते इसक ा लोकसभा में भी पारित हो पाना नामुमकिन तो हरगिज नहीं है। हां, उसके लिए केंद्र सरकार और उसका नेतृत्व कर रही कांग्रेस को थोड़ा साहस अवश्य दिखाना पड़ेगा, क्योंकि महिला आरक्षण विधेयक के धुर विरोधियों के खुल कर विपक्ष में आ जाने के बाद लोकसभा में सरकार का समर्थन पहले जितना सुविधाजनक और विश्वसनीय नहीं रह जायेगा। ध्यान रहे कि जब मनमोहन सिंह सरकार को बिना मांगे बाहर से समर्थन दे रहे समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल सरीखे दलों ने केंद्रीय बजट पेश किये जाते समय सदन से वॉकआउट किया था तो सरकार के पास सदन में महज चार मतों का ही समर्थन रह गया था।
बेशक महिला आरक्षण विधेयक पर मतदान के समय लोकसभा में ऐसी किसी अनहोनी की आशंका नहीं है,क्योंकि केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी के बजट भाषण का वॉकआउट करने वाले भाजपा और वाम मोर्चा इस आरक्षण विधेयक का समर्थन कर रहे हैं और उनके इस समर्थन पर संदेह का कोई कारण नजर नहीं आता। इसलिए अगर मनमोहन सिंह सरकार और कांग्रेस आलाकमान महिला आरक्षण विधेयक को लोकसभा में पेश करने का साहस जुटा लेती है तो उसके पारित होने में कोई शक नहीं होना चाहिए, पर यही सरकार और कांग्रेस के नेतृत्व की महिला सशक्तीकरण के प्रति बहु प्रचारित प्रतिबद्धता की असली परीक्षा भी होगी। यह कोई गोपनीय रहस्य नहीं है कि राज्यसभा में सोमवार के घटनाक्रम के बाद मनमोहन सरकार के हाथ-पांव फूल गये थे और सोनिया गांधी के इरादों के चलते ही महिला आरक्षण विधेयक पर मंगलवार को चर्चा और मतदान हो पाया, जिसमें इसे एक के मुकाबले 186 मतों से पारित भी कर दिया गया, पर लोकसभा का संख्या गणित राज्यसभा जितना आसान नहीं है।
महिला आरक्षण विधेयक के मौजूदा स्वरूप के धुर विरोधी सपा, बसपा और राजद की संख्या तो राज्यसभा के मुकाबले लोकसभा में ज्यादा है ही, जनता दल यूनाइटेड के भी लोकसभा सदस्यों का बहुमत अपने अध्यक्ष शरद यादव के साथ है, जो इस विधेयक के पुराने मुखर विरोधी हैं। ध्यान रहे कि राज्यसभा में जनता दल यूनाइटेड के सदस्यों ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतिश कुमार का साथ देते हुए विधेयक का समर्थन किया था। फिर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में शामिल दूसरे बड़े घटक दल तृणमूल कांग्रेस ने राज्यसभा में भी मतदान का बहिष्कार किया था। तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी जिस सरकार में रेल मंत्री हैं, उसी से इस बात पर नाराज हैं कि उसने महिला आरक्षण विधेयक के लिए भाजपा और वाम मोर्चा से तो समर्थन लिया, पर उनकी पार्टी से बात तक नहंी की। ममता बनर्जी और मायावती की राजनीति के बारे में कभी भी कोई भविष्यवाणी कर पाना मुश्किल है। इसलिए लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक पेश करने से पहले सरकार को कई बार सोचना पड़ेगा, पर सरकार के लिए दोस्त से दुश्मन बनते इन तमाम दलों की नाराजगी वित्त विधेयक पर मतदान के मद्देनज़र ज्यादा भारी पड़ सकती है। मुख्य विपक्षी भाजपा ने पहले ही कह दिया है कि वह वित्त विधेयक पर कटौती प्रस्ताव लायेगी। बजट से वाम मोर्चा भी खफा है। ऐसे में अगर वित्त विधेयक पर मतदान के वक्त सपा, बसपा, राजद के साथ-साथ कुछ और दल भी सरकार को सबक सिखाने के मूड में आ गये तो लेने के देने भी पड़ सकते हैं। फिर भी महिला आरक्षण विधेयक महिला सशक्तीकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। देश की आधी आबादी को सत्ता-राजनीति में हिस्सेदारी मिलनी ही चाहिए। पहले ही बहुत विलंब हो चुका है, इसलिए इस काम में अब अनावश्यक विलंब भी नहीं किया जाना चाहिए। लोकसभा और फिर 50 प्रतिशत विधानसभाओं की मंजूरी की संवैधानिक औपचारिकता जितनी जल्दी पूरी हो पाये, अच्छा है। हां, अगर इस प्रक्रिया में विरोधियों को भी अंतत: साथ लाया जा सके तो निश्चय ही उपलब्धि की खुशी और भी बढ़ जायेगी तथा राज्यसभा में जो कुछ अशोभनीय हुआ, उससे भी बचा जा सकेगा।


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